इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है, लेकिन भागीरथपुरा में जहरीले पानी की घटना ने सबकी आंखें खोल दीं हैं. जर्जर पाइप लाइनों से सीवेज पीने के पानी में घुल गया, जिससे कई लोगों की जान चली गई. इस घटना के बाद कराए गए नगर निगम के ऑडिट में पता चला है कि इंदौर में ही 650 किलोमीटर पाइपलाइनें खराब हो चुकी हैं. यह समस्या केवल इंदौर तक सीमित नहीं, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर जैसे पुराने शहरों में भी यही हाल है. पुरानी इंफ्रास्ट्रक्चर और रखरखाव की कमी ने पूरे मध्य प्रदेश को खतरे में डाल दिया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कई फैसलों में साफ कहा है कि स्वच्छ पेयजल संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है. जब प्यास बुझाना जानलेवा बन जाए, तो यह स्थानीय प्रशासन की नैतिक और कानूनी नाकामी है. स्वच्छ पानी कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी जरूरत है.
भागीरथपुरा जैसी त्रासदी बताती है कि शहरों का सौंदर्यीकरण तो हो रहा है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान कम है. स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में करोड़ों खर्च होते हैं, पर पाइप लाइनों का हाल देखें तो विकास का दावा अधूरा लगता है. भागीरथपुरा के बाद प्रदेश के सभी 413 नगरीय निकायों में वॉटर ऑडिट अनिवार्य बनाना चाहिए. ज्यादातर शहरों के पुराने इलाकों में पाइप लाइनें 30-50 साल पुरानी हैं. वाटर ऑडिट से सड़ी-गली पाइपें ढूंढकर तुरंत बदली जा सकेंगी. पेयजल और ड्रेनेज लाइनें पास-पास होने से क्रॉस-कनेक्शन बन जाते हैं, जो समय बम की तरह हैं. जाहिर है ऑडिट इन बिंदुओं को चिह्नित कर सुधार सकता है.रिपोर्ट्स बताती हैं कि 40 से 60 प्रतिशत शुद्ध पानी लीकेज से बर्बाद हो जाता है. ऑडिट से रिसाव रोककर जल संकट कम होगा. इसके अलावा रासायनिक और जैविक जांच से हैजा, टाइफाइड, ई-कोलाई जैसी महामारियां पहले ही रोकी जा सकेंगी. ये कदम न केवल जान बचाएंगे, बल्कि संसाधनों का सदुपयोग भी सुनिश्चित करेंगे. हालांकि
वॉटर ऑडिट लागू करने में चुनौतियां भी हैं. कई नगर निगमों के पास तकनीक और विशेषज्ञता की कमी है. बजट अभाव से रखरखाव टलता रहता है. फिर भी, केंद्र की जल जीवन मिशन योजना का लाभ उठाकर इसे संभव बनाया जा सकता है. सरकार हर जिले में ऑडिट टीम गठित करे, जिसमें इंजीनियर, वैज्ञानिक और स्थानीय प्रतिनिधि शामिल हों. ऑडिट के बाद ‘पाइपलाइन हेल्थ कार्ड’ जारी हो, जिसमें स्थिति, मरम्मत योजना और समय सीमा स्पष्ट हो. जनता को भी जागृत किया जाए. इसके अलावा शहरों में वॉटर मीटर लगवाएं और शिकायत पोर्टल सक्रिय रखें.
कुल मिलाकर भागीरथपुरा की त्रासदी चेतावनी है. सरकार केवल इंदौर पर न रुके, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए ‘सुरक्षित पेयजल प्रोटोकॉल’ बनाए. जनता का पैसा सौंदर्य पर पहले खर्च न हो, बल्कि उन पाइप लाइनों पर लगे जो रसोई और बच्चों के गिलास तक जाती हैं. अगर पानी सुरक्षित नहीं, तो विकास के दावे खोखले हैं. समय है कि वॉटर ऑडिट विकल्प न रहे, अनिवार्य बने. इससे न केवल जीवन सुरक्षित होंगे, बल्कि मध्य प्रदेश सच्चे अर्थों में स्वच्छ और स्वस्थ राज्य बनेगा. जाहिर है पूरे प्रदेश में वॉटर ऑडिट कराना जरूरी है.
