अनुशासनात्मक कार्रवाई की डर से निचली अदालतों में जमानत न देने की प्रवृति बढ़ रही है: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली, 05 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि देशभर की निचली अदालतों के न्यायाधीश जमानत देने में कतरा रहे हैं और ऐसा मामलों में योग्यता की कमी के कारण नहीं, बल्कि विभागीय या अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने के निरंतर डर के कारण हो रहा है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने चेतावनी दी कि डर का यह माहौल जिला स्तर पर न्यायिक स्वतंत्रता को खत्म कर रहा है। इसी वजह से उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में जमानत याचिकाओं की संख्या बढ़ रही है।

पीठ ने पाया कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ केवल संदेह के आधार पर या विवेक के कथित गलत इस्तेमाल के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने से मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों में हिचकिचाहट पैदा हो गई है और वे उन मामलों में भी जमानत देने से डर रहे हैं जहाँ कानून स्पष्ट रूप से इसकी अनुमति देता है।

न्यायालय ने आगाह किया कि ऐसा दृष्टिकोण न्यायाधीशों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने से रोकता है। पीठ ने कहा, “इन आशंकाओं का न्यायिक निर्णय लेने पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यदि प्रशासनिक कार्रवाई के डर से मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश हकदार मामलों में जमानत देना बंद कर देंगे, तो पूरी न्याय प्रणाली प्रभावित होगी।”

ये टिप्पणियां मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए की गईं। उस अधिकारी को भ्रष्टाचार और आबकारी कानून के तहत जमानत याचिकाओं में अलग-अलग मानक अपनाने के आरोपों में सेवा से हटा दिया गया था।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने इस बात पर जोर दिया कि जमानत देने में महज एक गलत आदेश या विवेक का त्रुटिपूर्ण इस्तेमाल, अपने आप में किसी न्यायाधीश के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जब जजों की स्वायत्तता से समझौता किया जाता है और न्यायिक स्वतंत्रता की जगह डर ले लेता है, तो कानून का शासन और लोकतांत्रिक मूल्य कमजोर हो जाते हैं।

न्यायालय ने कहा कि समय के साथ मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों में जमानत मामलों में अपने विवेक का इस्तेमाल करने से बचने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो आपराधिक मामलों में न्यायिक जांच की पहली कड़ी के रूप में उनकी भूमिका को कमजोर करती है। उच्चतम न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों से आग्रह किया कि वे यह सुनिश्चित करें कि न्यायिक अधिकारियों को केवल इसलिए जांच के दायरे में न लाया जाए क्योंकि बाद में उनका कोई आदेश गलत पाया गया।

न्यायालय ने जोर देकर कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप न्यायाधीशों को बिना किसी दबाव के निडर होकर न्याय करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

 

 

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