दिल्ली डायरी
प्रवेश कुमार मिश्र
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों आरएसएस के संदर्भ में जो कुछ भी कहा है उससे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है. लगातार संघ व भाजपा के प्रति हमलावर रुख रखने वाले दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर एक फोटो जारी करते हुए जिस तरह से संघ व भाजपा की संगठनात्मक शक्ति की तारीफ की है उसके अलग-अलग मायने तलाशे जा रहे हैं. जहां एक तरफ भाजपाई नेता अपनी तारीफ के पीछे छुपे राजनीतिक तथ्यों को तलाश रहे हैं वहीं दूसरी ओर कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह के रूख में आए अचानक बदलाव के कारण को समझने में लगे हैं. सोशल मीडिया पर भी उनके बयान को लेकर लगातार प्रतिक्रिया आ रही है. हालांकि दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट रूप से संघ की विचारधारा को अस्वीकार किया है. लेकिन उनके बयान को आधार बनाकर पार्टी के अंदर सुगबुगाहट शुरू हो गई है. कुछ नेता इसे एक सलाह के तौर पर देखते हुए सुधारात्मक कदम उठाने की बात कह रहे हैं तो कुछ नेता इसे गैरवाजिब करार दे रहे हैं.
गुप्त बैठक पर चौकन्ने भाजपाई रणनीतिकार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर देने वाले भाजपाई ब्राह्मण विधायकों की बैठक को भले अलग-अलग तर्क देकर भाजपाई रणनीतिकार असर हीन करने में लगे हैं लेकिन लखनऊ से लेकर दिल्ली तक इस बैठक की चर्चा जोरों पर है. लगभग 50 विधायक व विधानपरिषद सदस्यों ने पहली बार जाति-आधारित बैठक कर भाजपाई रणनीतिकारों को चौंका दिया है. हालांकि सूबे के नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने चेतावनी देते हुए जाति के आधार पर बैठक नहीं करने का संदेश दिया है लेकिन चर्चा यह है कि आखिर किस परिस्थिति में राज्य सरकार पर एक खास वर्ग के साथ भेदभाव का आरोप लगाया है. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बैठक के माध्यम से विधायकों ने केंद्र व राज्य संगठन को बहुत बड़ा संदेश देते हुए अपनी भविष्य की योजनाओं को रेखांकित करने का प्रयास किया है. कहा जा रहा है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा ऐसे विधायकों पर दवाब बनाने के बजाय उनके साथ व्यक्तिगत विमर्श कर डैमेज कंट्रोल करने को कहा गया है.
सुलझ नहीं रहा है कर्नाटक कांग्रेस का अंतर्कलह
पिछले छह माह से कर्नाटक में नेतृत्व बचाने व परिवर्तन को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच जारी अंतर्द्वंद्व समाप्त होता नहीं दिख रहा है. दर्जनों बार पार्टी के वरिष्ठ रणनीतिकारों द्वारा बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया है लेकिन अभी भी टकराव बना हुआ है. डीके शिवकुमार गुट का तर्क है कि सरकार गठन के समय दोनों पक्षों को ढ़ाई-ढ़ाई वर्ष तक मुख्यमंत्री की कुर्सी दिए जाने की बात हुई थी जबकि सिद्धारमैया गुट के नेताओं का दावा है कि पार्टी हाईकमान ने कभी भी इस तरह का आश्वासन नहीं दिया था. हालांकि पार्टी नेतृत्व द्वारा लगातार समन्वय बैठाने का प्रयास किया जा रहा है. चर्चा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री सिद्धारमैया व उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से अलग-अलग व्यक्तिगत मुलाकात कर उन्हें एकजुट रहने की हिदायत दी है. लेकिन अभी भी टकराव बना हुआ है.
मनरेगा बचाओ अभियान के सहारे गांव-गांव पहुंचने की तैयारी
कांग्रेस पार्टी भले ही संसद में मनरेगा योजना में किए गए आमूलचूल परिवर्तन को रोकने में असफल रही है लेकिन वह अब इस योजना की अच्छाई और नए नामकरण के साथ योजना में किए गए कथित तौर पर उद्देश्यपूर्ण बदलाव को आधार बनाकर गांव-गांव पहुंचने की तैयारी में है. हालांकि मनरेगा की जगह लेने वाले विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन यानी वीबी-जी राम जी ग्रामीण अधिनियम के पक्ष में सरकार द्वारा तथ्यात्मक जानकारी देते हुए कथित भ्रम को दूर करने की कोशिश की जा रही है. ग्रामीण विकास मंत्री शिवराजसिंह चौहान इसके लिए खुद मोर्चा संभाले हुए हैं लेकिन कांग्रेसी रणनीतिकार दूरगामी सोच के साथ इसे गांव-गांव में चर्चा कराकर महात्मा गांधी के नाम को हटाने के कारण व कारकों को आधार बनाकर सरकार पर दबाव बनाने के प्रयास में लगे हैं
