
भोपाल। हमें दफनाओ मत हम मर गए हैं बस इतनी ही तो बात है।
यह पंक्तियां जैसे ही मंच से गूंजीं रवींद्र भवन में सन्नाटा छा गया। दर्शक दीर्घा में बैठे लोग अचानक युद्ध और सैनिकों की उस पीड़ा से रूबरू हो गए, जिसे अक्सर सम्मान और नारों के पीछे छुपा दिया जाता है।
मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय द्वारा प्रस्तुत नाटक दफ्न करो का मंचन मंगलवार शाम रवींद्र भवन में किया गया। मंच पर छह शव सफेद चादरों में लिपटे थे। प्रकाश संयोजन और पार्श्व वाद्य संगीत के साथ कब्र खोदते चार सिपाही और एक सार्जेंट का दृश्य युद्ध की भयावह सच्चाई को सामने रख रहा था।
नाटक की शुरुवाती क्षण में मंच के एक छोर पर छह महिलाएं थीं। कोई गर्म कपड़े सिल रही थी, कोई सैनिक की वर्दी इस्त्री कर रही थी, तो कोई अपने बेटे के जूते सहेज रही थी तो कोई प्रिय की तस्वीर थामे बैठी थी। आंखों में उदासी और चेहरे पर प्रतीक्षा का दर्द लिए ये दृश्य दर्शकों को भीतर तक छू गए। वहीं कब्र के पास बैठे चार सैनिकों को टुकड़ियों द्वारा गया गया गीत उनके मन की व्यथा कह गया।
नाटक की कथा युद्ध में मारे गए छह सैनिकों के इर्द गिर्द घूमती है। जो दफन होने से इनकार कर देते हैं। वे सवाल उठाते हैं कि यदि युद्ध महान है तो मरने वाले वही क्यों हैं। लेखक इरविन शॉ की यह रचना युद्ध की निरर्थकता और सत्ता की क्रूरता पर तीखा प्रहार करती है। निर्देशक सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ के निर्देशन में छात्रों की यह प्रस्तुति भावनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर प्रभावी रही। कुल 24 कलाकारों की इस प्रस्तुति ने यह स्पष्ट कर दिया कि युद्ध में केवल शरीर नहीं मरते बल्कि संवेदना और मानवता भी घायल होती है। यह नाटक केवल एक मंचीय प्रस्तुति नहीं बल्कि युद्ध के खिलाफ उठी एक मजबूत आवाज बनकर सामने आया।
