माध्यमिक शाला कंजवार बना खंडहर से नवाचार तक सीखने का राष्ट्रीय मॉडल

सीधी। कभी बंद होने के कगार पर खड़ी शासकीय माध्यमिक शाला कंजवार आज नवाचार, सहभागिता और परिणाम आधारित शिक्षा का ऐसा उदाहरण बन चुकी है जिसकी चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है। यह परिवर्तन शिक्षक शैलेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व, अथक प्रयास और समाज के सहयोग से संभव हो सका है।

विद्यालय को भयमुक्त, स्वच्छ और आनंददायी वातावरण में बदलते हुए बच्चों के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान दिया गया। विद्यालय परिसर में बिरसा मुंडा उद्यान की स्थापना, क्यूआर कोड युक्त फलदार एवं छायादार 500 से अधिक पौधों का रोपण, जन्मदिन पर बच्चों व ग्रामीणों द्वारा पौधारोपण तथा पौधों की सुरक्षा की जिम्मेदारी बच्चों को सौंपना इन प्रयासों ने बच्चों को प्रकृति से भावनात्मक रूप से जोड़ा। बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान को मजबूत करने के लिए विद्यालय में एक अनूठा प्रयोग किया गया। हर शनिवार बैगलेस डे के रूप में मनाया जाता है जिसमें कक्षा 1 से 8 तक के 176 विद्यार्थी बिना बैग के विद्यालय आते हैं। विद्यालय परिसर में निर्मित लगभग 400 एसीपी शीट से बने गेम प्लेस पर 4000 से अधिक शैक्षणिक जानकारियां अंकित हैं।

बच्चे अपनी रुचि के अनुसार हिन्दी, गणित, अंग्रेजी, पर्यावरण जैसे विषयों को खेल-खेल में सीखते हैं और उसे अपने वास्तविक जीवन से जोड़ते हैं। विद्यालय परिसर के पौधों पर लगाए गए क्यूआर कोड को स्कैन कर बच्चे पौधों के नाम, उपयोग और पर्यावरणीय महत्व की जानकारी प्राप्त करते हैं। यह पहल आईसीटी आधारित शिक्षा को जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से लागू करने का सशक्त उदाहरण है। इन नवाचारों का सीधा असर विद्यालय की उपस्थिति, नामांकन और शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ा है।

आज स्थिति यह है कि दूसरे गांवों से भी अभिभावक अपने बच्चों का प्रवेश यहां करा रहे हैं। विद्यालय के बच्चों का चयन विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में होना इस परिवर्तन की सफलता को प्रमाणित करता है।

राष्ट्रीय स्तर पर अनुकरणीय परिवर्तन

जो विद्यालय कभी जर्जर अवस्था में था और बंद होने की स्थिति में पहुंच गया था वही विद्यालय आज राष्ट्रीय स्तर पर अपनाए जाने योग्य नवाचारों का मॉडल बन चुका है। शिक्षक शैलेन्द्र प्रताप सिंह का यह प्रयास यह सिद्ध करता है कि प्रतिबद्ध नेतृत्व, नवाचार और समाज की भागीदारी से सरकारी विद्यालयों की तस्वीर बदली जा सकती है।

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