सुना है कि हम “बहुत प्रगति” कर गए हैं

*कहाँ गए वो दिन?
और कहाँ गए हम?*
(व्यंग्य–लेख)
(डॉ. अमृता अवस्थी)

सुना है कि हम “बहुत प्रगति” कर गए हैं।इतनी प्रगति कि अब हमें अपनी माँ की उँगलियों के फंदे भी पुराने ज़माने की चीज़ लगते हैं। अब स्वेटर नहीं, “ब्रांडेड जैकेट्स” पहनते हैं—जिनमें न प्यार की लूप होती है, न दादी की डाँट। बस एक टैग होता है, और हम उसी टैग को गरमाहट समझ लेते हैं।

कभी घर में रहने वाली हों या ऑफिस जाने वाली—हर महिला शाम को एक ही सुपरपावर का प्रयोग करती थी: सलाई की चर्र-चर्र।
हर फंदे में प्यार, हर टांके में अपनापन।
आज सलाई छोड़कर सबकी उँगलियों में सिर्फ़ फोन है—और फोन के फंदों में सिर्फ़ रीलें।
लोग पूछते हैं: “आप बुनाई करती थीं?”
मन करता है कह दूँ—“हाँ भाई, हम वो लोग हैं जो ऊन से कपड़ों के साथ-साथ रिश्ते भी बुन लिया करते थे।”

पहले पड़ोसनें एक-दूसरे से डिज़ाइन शेयर करती थीं हां कुछ सिक्रेट डिजाइन छोड़कर।
अब?डिज़ाइन तो दूर, लोग अपने वाई-फाई का पासवर्ड तक नहीं शेयर करते।

अचार-पापड़,बडी कभी पूरा मौसम हुआ करते थे—घर का, रिश्तों का, बातचीत का।
अब बाजार के रेडीमेड पापड़ खाइए और विश्वास रखिए कि परिवार भी “रेडीमेड” भावनाओं से चलने लगा है।
पहले दाल से कंकड़ चुनते-चुनते घर के लोग एक-दूसरे की शिकायतें भी चुन लेते थे।
आज दाल साफ है, पर रिश्तों में कंकड़ भर गए हैं।

मुझे तो लगता है कि हमने आधुनिकता के नाम पर कुछ ज़्यादा ही “सफाई” कर दी है—
धूप में बैठने का वक्त साफ कर दिया,
आँगन की हँसी साफ कर दी,
दादी की गप्पें साफ कर दिये,
और अंत में… रिश्तों का समय भी साफ कर दिया।

पहले मटर छीलते-छीलते गपशप निकलती थी।
आज प्रेशर कुकर में मटर मिनटों में बन जाती है, पर गपशप?
वो तो अब किसी ग्रुप चैट में भी नहीं पकती।

हम कहते हैं—“समय बदल गया।”
समय बेचार क्या बदलता!
बदले तो हम—और वो भी इतनी तेजी से कि अब हमारी रफ्तार को सिर्फ़ ऑनलाइन डिलीवरी पकड़ सकती है।

सच यह है—
जैकेटें महंगी हो गई हैं, पर दिल और भी ठंडे।
ब्रांड बढ़ गए हैं, लेकिन घर से वो घरेलू गर्माहट ऐसे गायब हुई है जैसे पुराने घरों से छप्पर।

काश कभी सर्दियों की धूप में फिर से कोई दादी सलाई उठाए…
और हम अपनी व्यस्तता के कंबल से सिर बाहर निकालकर पूछ लें—
“दादी, एक फंदा मुझे भी सिखा दो।”

शायद उसी दिन पता चले कि असली गर्मी ऊन से नहीं, उन्हीं हाथों से आती है जिनमें प्यार बुनने की काबिलियत हुआ करती थी।

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