ग्वालियर: संगीत की नगरी ग्वालियर में 101वें तानसेन संगीत समारोह के अंतर्गत माधव संगीत महाविद्यालय में द्वितीय पूर्वरंग सभा शास्त्रीय संगीत की मोहक धुनों से सरोबार रही। भारतीय संगीत की परंपरा, नाद की महिमा और रागों की अद्भुत रस-धारा ने कार्यक्रम को सुर-श्रृंगार का अनुपम रूप प्रदान किया।कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती जी पर दीप प्रज्वलन एवं पुष्प अर्पण से हुआ। माधव संगीत महाविद्यालय की प्राचार्या वीणा जोशी, गंगा दास शाला के महंत श्री रामसेवक दास एवं ध्रुपद केंद्र के गुरु अभिजीत सुखदाणे विशेष रूप से उपस्थित रहे। संचालन अनिकेत तारलेकर और साक्षी कुलश्रेष्ठ ने किया।
सुरों की प्रथम रश्मि : सुदीप भदौरिया का ध्रुपद गायन
कार्यक्रम की प्रथम प्रस्तुति में सुदीप भदौरिया ने राग जोग के गंभीर, माधुर्यपूर्ण आलाप से वातावरण को ध्यानमय कर दिया। आलाप (मध्य और द्रुत लय) की मनोहारी विस्तार से उन्होंने ध्रुपद की पारंपरिक गरिमा को उजागर किया। इसके बाद धमार की सुप्रसिद्ध रचना “आज ब्रजराज होरी खेलत वृंदावन में” प्रस्तुत कर कृष्ण भक्ति की अनुभूति कराई। उन्होंने अंतिम प्रस्तुति में ताल तीव्रा की बंदिश “नाद भेद सो न्यारो” ने नादयोग की गूढ़ता को अभिव्यक्त किया।
वायलिन का सुर-संवाद : अंकुर धारकर की प्रस्तुति
दूसरी प्रस्तुति में अंकुर धारकर ने वायलिन वादन के माध्यम से राग बिहाग की कोमल, श्रृंगारिक और कोमल भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने आलाप से राग का रूप उजागर किया फिर विलंबित एकताल और मध्यलय तीनताल में गत प्रस्तुति से मन को मोह लेने वाला सुर-संवाद रचा
