ग्वालियर: आईआईटीटीएम ग्वालियर में शहरी पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता की महत्ता पर केंद्रित तीन दिवसीय संवेदनशीलता कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। यह कार्यशाला शहरी जैव विविधता एवं पारितंत्र सेवाएं विषय पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य शहरों में तेजी से बदलते पारितंत्र, घटते प्राकृतिक संसाधनों और संरक्षण की जरूरतों को समझना है। आईआईटीटीएम के निदेशक डॉ.आलोक शर्मा ने कहा कि शहरीकरण के दौर में प्रकृति संरक्षण केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन का अनिवार्य अंग बन गया है।
उन्होंने शहरों में हरित क्षेत्र, जलस्रोतों और स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण की दिशा में जागरूकता और तकनीकी समझ दोनों को आवश्यक बताया। जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर के भू-विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. एस. एन. मोहापात्रा ने ‘जियोडायवर्सिटी’ के महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसी क्षेत्र की भौगोलिक विविधता वहां की जैव विविधता, जीवन-प्रणालियों तथा सांस्कृतिक धरोहर पर गहरा प्रभाव डालती है।
शहरी नियोजन में जियोडायवर्सिटी के सिद्धांतों का समावेश सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है। वन्यजीव संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक-एफ डॉ. गौतम तलुकदार ने कार्यशाला की रूपरेखा और उद्देश्यों का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शहरी पारितंत्र तेजी से बदल रहा है और ऐसे समय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम के विभिन्न तकनीकी सत्र डब्ल्यूएलएल की विशेषज्ञ टीम के डॉ. भूमेश सिंह भदौरिया, सुश्री अनन्या दास, सुश्री स्नेहा पांडेय और सुश्री दीपिका सैरे द्वारा संचालित किए गए। इन सत्रों में शहरी जैव विविधता के घटते स्वरूप, पारितंत्र सेवाओं के आर्थिक–सामाजिक महत्व, संरक्षण में तकनीकी हस्तक्षेप (जैसे जीआईएस, ड्रोन सर्वे, डेटा मॉनिटरिंग) तथा क्षेत्रीय प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित विस्तृत चर्चा हुई।कार्यशाला में शहर के शिक्षाविदों, टाउन एवं कंट्री प्लानिंग विभाग के विशेषज्ञों, स्थानीय निकायों, पर्यावरण शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लेते हुए अपने अनुभव, चुनौतियां और सुझाव साझा किए।
