
जबलपुर। हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि विवाह पूर्व बीमारी छुपाना और बीमार करने की साजिश करने का आरोप लगाना क्रूरता की श्रेणी में आता है। दूसरा पक्ष अपने जीवन साथी की सेहत को लेकर टेंशन में रहते हुए ज़िंदगी भर परेशान रहेगा। उसे आर्थिक तथा इमोशनल नुकसान उठाना पड़ा। हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट तथा जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने कुटुम्ब न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता पति के पक्ष में ज्यूडिशियल सेपरेशन के आदेश जारी किये है।
मंडला निवासी डॉ महेन्द्र कुशवाहा की तरफ से दायर की गयी अपील में कुटुम्ब न्यायालय के द्वारा ज्यूडिशियल सेपरेशन के आवेदन को निरस्त करते हुए वैवाहिक अधिकारों की बहाली के आदेश जारी किये जाने को चुनौती दी गयी थी। अपील में कहा गया था कि उसकी अनावेदिका से अरेंज मैरिज हुई थी। विवाह के पूर्व अनावेदिका को मिर्गी के दौरे आते थे, इस बीमारी के संबंध में उसे जानकारी नहीं दी गयी थी। उसे थायराइड की बीमारी के संबंध में बताया गया था। अनावेदिका को जून व जुलाई 2022 में मिर्गी के दौरे आये थे। जिसके बाद पति ने उसे छोड़ दिया था और ज्यूडिशियल सेपरेशन के लिए कुटुम्ब न्यायालय में आवेदन किया था। ज्यूडिशियल सेपरेशन के आवेदन की सुनवाई के दौरान अनावेदक पत्नी ने इस बात से साफ इंकार कर दिया कि वह मिर्गी की बीमारी से पीड़ित है। उसने अपने पति व सास पर बदनीयती से बीमार करने उसे बहुत मीठा खाना दिये जाने के आरोप लगाये थे।
अनावेदक पत्नी की तरफ से तर्क दिया गया कि ज्यूडिशियल सेपरेशन की इजाज़त दी जाती है तो इससे उसकी परेशानियां बढ़ जाएंगी। बीमारी के मुश्किल समय में यह उसके साथ क्रूरता होगी। पति को पत्नी की देखभाल करनी चाहिए और कोर्ट में ज्यूडिशियल सेपरेशन की अपील नहीं करनी चाहिए थी। मिर्गी कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज नहीं है। उसे यह बीमारी शादी के बाद हुई है।
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि हर इंसान के पास शादी का पार्टनर चुनने का ऑप्शन होता है। वह बायोडाटा देखने, एक-दूसरे से मिलने और परिवार के सदस्यों और दोस्तों से बात करने के बाद एक-दूसरे से शादी करते हैं। अपीलकर्ता को मिर्गी की बीमारी के बारे में बताया गया होता तो शायद वह अनावेदक से शादी करने का अपना ऑप्शन नहीं चुनाता। शादी के बाद यह बीमारी हुई होती तो पति का फ़र्ज़ था कि वह पत्नी का ध्यान रखे। सच छिपाकर अपीलकर्ता के साथ धोखा किया गया है। बाद में उस पर साज़िश का झूठा आरोप लगाया गया। अनावेदक का यह बर्ताव क्रूरता के बराबर है, जो हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के सेक्शन 13(1)(पं) के तहत क्रूरता के दायरे में आएगा।
