बिहार में सुशासन की चाबी अब भाजपा के हाथ

दिल्ली डायरी

प्रवेश कुमार मिश्र

बिहार विजय के बाद भले ही भाजपाई रणनीतिकारों ने औपचारिक तौर पर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर एकजुटता का संदेश दिया है लेकिन मंत्रियों के विभाग बंटवारे में जिस तरह से गृह विभाग जैसा महत्वपूर्ण विभाग भाजपा ने सम्राट चौधरी को दिलाया है उससे साफ है कि सुशासन की चाबी अब नीतीश बाबू के हाथ निकलकर भाजपा के पास चली गई है.

चर्चा है कि नीतीश कुमार को जिस सख्त प्रशासनिक निर्णय और नियंत्रण के कारण सुशासन बाबू कहा जाता रहा है वह ताकत यानी गृहमंत्रालय ही अब उनके पास नहीं रह गया है इसलिए अब पटना से लेकर दिल्ली तक यह चर्चा की जा रही है कि बिहार की कानून व्यवस्था को दुरूस्त करने की जिम्मेदारी से भाजपाई रणनीतिकारों ने नीतीश कुमार को मुक्त कर एक तीर से कई निशाने साध दिए हैं . हालांकि कैबिनेट की पहली बैठक में पांच साल में एक करोड़ नौकरी देने का निर्णय कर नीतीश कुमार ने सुशासन को कानून व्यवस्था से आगे बढ़ाकर विकास परक करने का प्रयास कर दुरगामी सोच को परिलक्षित करने का प्रयास किया है.

एसआईआर पर बंगाल से लेकर दिल्ली तक हंगामा

चुनाव आयोग द्वारा बंगाल के साथ-साथ देश के कई राज्यों में एसआईआर कराने का समयबद्ध कार्यक्रम का विरोध जिस तरह से राजनीतिक दलों के साथ-साथ बीएलओ स्तर के कर्मचारी कर रहे हैं उसके कारण दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में बहुस्तरीय चर्चा आरंभ हो गई है. हालांकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी विचाराधीन है फिर विपक्षी राजनीतिक दलों का स्पष्ट आरोप चुनाव आयोग पर लगाया जा रहा है.

आयोग की निष्पक्षता को लेकर वैसे भी कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने अपने तर्कों व कथित साक्ष्यों के आधार पर आरोप लगाने का प्रयास किया है लेकिन अभी भी आयोग का रूख सख्त बना हुआ है. एसआईकार को जमीनी स्तर पर कार्यान्वित करने वाले कई बीएलओ द्वारा कथित दबाव में आत्माहत्या को लेकर भी राजनीतिक दल आयोग पर हमलावर हैं. हालांकि एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय में मामला चल रहा है तो दूसरी ओर राजनीतिक दल इस अभियान को अपने स्तर से पारदर्शी बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से अपने संगठनों के जमीनी स्तर के पदाधिकारियों को भी सक्रिय कर रहे हैं. यानी हंगामा और तैयारी दोनों चल रहा है.

बिहार हार के बाद बिखराव के कगार पर इंडिया गठबंधन

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेसी रणनीतिकारों का इंडिया गठबंधन से मोहभंग होने लगा है. इसी वजह से कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग गठबंधन की राजनीति के बजाय अपने दम पर आगे बढ़ने के पक्ष में दलील दे रहा है. चर्चा है कि गांधी परिवार में भी इस विषय को लेकर एक राय नहीं बन पा रही है. कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ रणनीतिकारों ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व राहुल गांधी को पत्र लिखकर गठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर करने के बजाय राजनीतिक जरूरत के हिसाब से राज्यस्तरीय करने की सलाह दी है. उनका कहना है कि किसी भी दल को नैसर्गिक गठबंधन सहयोगी मानकर हमेशा नुकसान झेलने व उनके हठी व्यवहार को बढावा देने के बजाय एक झटके में एकला चलो की घोषणा करना चाहिए. इतना ही नहीं चुनावी हार के लिए जिम्मेदार पार्टी पदाधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई करने की भी आवाज उठ रही है.

कर्नाटक कांग्रेस का अंतर्कलह दिल्ली पहुंचा

आरंभिक दिनों से ही दो खेमों में बंटी कर्नाटक कांग्रेस के डीके शिवकुमार गुट के नेताओं ने एकबार फिर मुख्यमंत्री बदलने की मांग के साथ दिल्ली में डेरा डाल रखा है. डीके गुट के दर्जनों विधायक पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर कर्नाटक बचाने के लिए सत्ता हस्तांतरण के फार्मूले को लागू कर शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की है. हालांकि अभी भी वरिष्ठ रणनीतिकारों द्वारा सुलह की जा रही है. जबकि दूसरी ओर भाजपाई रणनीतिकार कांग्रेस अंदर मचे इस हलचल पर नजर डालें हुए हैं.

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