
सीहोर। रातापानी टाइगर रिजर्व में दूसरे चरण की बाघों की गणना शुरू हो गई। सीहोर क्षेत्र में करीब 55 कैमरों की मदद से बाघों की ट्रैपिंग की जाएगी। जिले में 35 से ज्यादा बाघ होने का अनुमान है। बाघों की गणना के दौरान जिले के वन क्षेत्र में 5 स्थानों पर बाघिन के साथ शावक भी नजर आए हैं.
गौरतलब है कि रातापानी सहित सीहोर, भोपाल और रायसेन की कुल 172 बीटों में करीब 350 से ज्यादा कैमरे लगाए जा चुके हैं. रातापानी में 85 कैमरों के साथ-साथ सीहोर के वन क्षेत्र में 55 कैमरे लगाए गए हैं. इस गणना की खास बात यह है कि पहली बार विशेष एप का उपयोग किया जा रहा है. इस विशेष एप एम-स्ट्राइप इकोलॉजिकल के जरिए बाघों का फिजिकल वैरिफिकेशन हो रहा है. एप में बीटगार्ड नेचर ट्रेल और ट्रांजिट लाइन पर पैदल चलकर मौके पर मिले बाघों के मल, खरोंच, पगमार्क, शिकार के अवशेष एप में फीड करेंगे. इसके साथ ही मौके की जीपीएस लोकेशन व फोटो भी रियल-टाइम में अपलोड होंगे. इससे डेटा सीधे डब्ल्यूआईआई (वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) तक पहुंचाया जाएगा और गणना के नतीजे पहले की तुलना में जल्दी मिल सकेंगे.
उल्लेखनीय है कि बाघों की गणना 20 जनवरी तक अलग-अलग चरणों में होगी. पहली बार टाइगर रिजर्व क्षेत्र से लगे कॉरीडोर में भी बाघों की गणना की जा रही है. हालांकि यह काम अगले चरण में होगा. अभी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में ही बाघों की गणना की जा रही है. अगले चरण में 20 दिसंबर से 20 जनवरी तक जंगल के बाकी हिस्से में कैमरे लगाकर बाघों की गणना करेंगे.
धारियों का मिलान कर होती है बाघों की पहचान
देशभर में हर चार वर्ष के बाद होने वाली इस गणना में पहले उन क्षेत्रों में कैमरे लगाए जाते हैं, जहां बाघों का मूवमेंट दर्ज होता है. कैमरों से मिले फोटो की धारियों का मिलान कर बाघों की पहचान तय होती है. इसके बाद पेड़ों पर खरोंच, बाघों के लोटने के निशान, मल, पगमार्क और यूरिन मार्किंग जैसी फील्ड एविडेंस की मदद से अंतिम संख्या निर्धारित की जाती है।.रातापानी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बाघों की गणना के लिए जिले सहित भोपाल और रायसेन की कुल 172 बीटों के लिए 344 बीटगार्ड और इतने ही सहयोगी वॉलेंटियर और बाघमित्र गणना में शामिल होंगे.
बुधनी के जंगल में सबसे अधिक बाघ
उल्लेखनीय है कि कई बार बाघ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र से लगे वन क्षेत्र में चले जाते हैं. जैसे कि बुदनी क्षेत्र का जंगल .यह जंगल सतपुड़ा टाइगर रिजर्व और रातापानी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से अलग है. इसलिए यहां दोनों ही क्षेत्र के बाघ पहुंच जाते हैं. इतना ही नहीं कई बार बाघ यहीं अपने टेरेटरी बना लेते हैं. यह क्षेत्र बाघों के घूमने और आने-जाने के लिए सहज और सरल मार्ग या जगह होती है.
