मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने रिटायरमेंट से ठीक पहले एक ऐसी बात कह दी है, जिसने देशभर में आरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी है. सवाल बड़ा है कि क्या अनुसूचित जातियों (एससी) में भी क्रीमी लेयर लागू होनी चाहिए ? आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावती में दिया गया उनका बयान कानूनी हलकों से लेकर राजनीतिक मंचों तक ज़ोरदार चर्चा का कारण बन गया है. जस्टिस गवई का कहना स्पष्ट है आरक्षण उन्हीं तक पहुंचे, जिनकी ज़रूरत सबसे ज्यादा है. अगर एक आईएएस अधिकारी का बच्चा और एक खेतिहर मजदूर का बच्चा एक ही श्रेणी में रख दिया जाए, तो यह सामाजिक न्याय की भावना से मेल नहीं खाता. जो परिवार सामाजिक-आर्थिक स्तर पर आगे बढ़ चुके हैं, क्या उन्हें लगातार आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए? यही मूल सवाल है. दरअसल,क्रीमी लेयर की अवधारणा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी (1992) फैसले में उभरी थी. इस फैसले में ओबीसी समुदाय के भीतर ‘सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग’ को आरक्षण से बाहर रखने का प्रावधान किया गया. लेकिन यह सिद्धांत आज भी केवल ओबीसी पर लागू होता है, न कि एससी और एसटी पर. दलित और आदिवासियों को आरक्षण आर्थिक वजहों से नहीं, बल्कि सदियों के भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक अपमान के कारण दिया गया था. यही कारण है कि कई विशेषज्ञों का तर्क है एससी श्रेणी में क्रीमी लेयर लागू करना संविधान की मंशा के अनुरूप नहीं होगा. उधर, एससी समुदाय में उप-वर्गीकरण की बहस भी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है. कई याचिकाएं लंबित हैं. जस्टिस गवई का सुझाव इसी दिशा में एक नया अध्याय जोड़ता है. बहरहाल,आरक्षण का कोई भी बदलाव राजनीति में तूफान ला सकता है. एससी और एसटी देश की सबसे प्रभावशाली मतदाता श्रेणियों में से एक हैं. समर्थकों का दावा है कि क्रीमी लेयर लागू होने से आरक्षण का लाभ सीमित परिवारों में न सिमटेगा और सबसे ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचेगा. विरोधियों का मत है कि एससी समुदाय आज भी जातिगत भेदभाव से जूझ रहा है. ऐसे में क्रीमी लेयर लागू करना सामाजिक सशक्तिकरण की गति रोक सकता है. राजनीतिक रूप से यह मुद्दा इतना संवेदनशील है कि इस पर सर्वसम्मति बनना लगभग असंभव लगता है. यदि इसे लागू करना हो तो संविधान संशोधन तक की जरूरत पड़ सकती है. दरअसल,जस्टिस गवई का विचार उचित है कि आरक्षण को संतुलित और न्यायसंगत बनाना जरूरी है. लेकिन सवाल कई हैं कि,क्या सामाजिक प्रतिष्ठा, शिक्षा और पद भी मानदंड होंगे ? क्या सरकार के पास इसके लिए ज़रूरी डेटा और संसाधन हैं ? जाहिर है बिना स्पष्ट नीति के कोई भी बदलाव भ्रम और विवाद को जन्म दे सकता है. कुल मिलाकर जस्टिस गवई का सुझाव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आरक्षण का असली उद्देश्य क्या है,आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करना, या ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना ?
अगर आरक्षण को सही मायने में सबसे नीचे खड़े व्यक्ति तक पहुंचाना है, तो उसके ढांचे पर शांत दिमाग से पुनर्विचार होना चाहिए. लेकिन इस बहस को संवेदनशीलता, व्यापक सहमति और ठोस कानूनी आधार के बिना आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. आज असली सवाल यही है कि क्या आरक्षण समान अवसर का उपाय है, या समान आर्थिक स्थिति का ? इस सवाल पर ठहरकर सोचने की जरूरत है, क्योंकि इसका असर आने वाली पीढिय़ों पर पड़ेगा.
