
रीवा।शहर का लगातार विकास हो रहा है वाहनो की संख्या बढऩे के साथ सडक़ो पर दबाव भी बढ़ रहा है. लेकिन यातायात व्यवस्था पुराने ढर्रे पर चल रही है, ऐसा कोई दिन नही जब जाम न लगे. एम्बुलेंस से लेकर अधिकारियों के वाहन जाम में फसते है.
यातायात थाने में वर्षो से थाना प्रभारी सहित सुबेदार जमे हुए है जब तक इनको हटाया नही जाएगा तब तक यातायात व्यवस्था पटरी पर नही लौटेगी. पिछले एक साल से बगैर डीएसपी के शहर यातायात थाना चल रहा है. लिहाजा यहा सबकी मनमानी चल रही है. रात 10 बजे से शहर के अंदर भारी वाहन प्रवेश करने लगते है जबकि रात 11 बजे के बाद शहर में प्रवेश करने की अनुमति है. शहर की सडक़ो और चौराहो पर यातायात पुलिस नजर नही आती है. सुबेदार और थाना प्रभारी गाडिय़ों में बैठ कर फर्राटा करते रहते है और जाम में लोग फसे रहते है. अमहिया मार्ग एवं धोबिया टंकी मार्ग में अक्सर अस्पताल आने वाली एम्बुलेंस जाम में फसती है. बीती शाम संजय गांधी अस्पताल के पास एम्बुलेंस जाम में फसी रही. वरिष्ठ अधिकारियों का भी ध्यान शहर में लगने वाले जाम की ओर नही जा रहा है. रेवांचल ट्रेन के समय और रीवा नई दिल्ली के समय अक्सर जयस्तंभ, सिरमौर चौराहा एवं ढ़ेकहा तिराहे पर जाम लगता है. कई बार शाम को जाम के चलते यात्रियों की ट्रेन भी छूट जाती है.
कई वर्षो से जिले में जमे है सुबेदार
शहर की यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी जिनके हाथो में है वह पिछले पांच वर्ष से रीवा जिले में पदस्थ है. आज तक स्थानान्तरण जिले से बाहर नही हुआ. सुबेदार अखिलेश कुशवाहा, शुभम चतुर्वेदी, अंजली गुप्ता पिछले कई वर्ष से जिले में है और यातायात थाने में पदस्थ है. अभी शुभम चतुर्वेदी पुलिस लाइन चले गए है, बीच-बीच में सुबेदार पुलिस लाइन और यातायात थाने में पदस्थ होते रहते है. लेकिन एक ही जिले में कई वर्षो से जमे हुए है. यातायात व्यवस्था को लेकर जानकार का मानना है कि जब तक वर्षो से जमे सुबेदार शहर से नही हटाए जाएगें तब तक यातायात व्यवस्था ठीक नही हो सकती है.
ई-रिक्शा और आटो के लिये कोई नियम नही
शहर के अंदर दौडऩे वाले ई-रिक्शा और आटो के लिये कोई नियम नही है न ही कोई रूट मार्ग निर्धारित है. जिस चालक की जहा मर्जी वही चलता रहता है. जाम का मुख्य कारण अब आटो रिक्शा बन चुके है. पूरी सडक़ पर केवल आटो ही नजर आते है. पूर्व में यातायात पुलिस द्वारा आटो के लिये रूट निर्धारित किया गया था और बकायदे आटो के पीछे नम्बर भी अंकित किये गये थे. यह प्रयोग कुछ दिन तक चला उसके बाद व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर आ गई है. न तो कोई रोकने वाला है और न ही देखने वाला है. आटो के लिये रूट का निर्धारण होना चाहिये ताकि एक मार्ग पर भीड़ और दबाव न बढ़े.
