
नई दिल्ली, 07 नवम्बर (वार्ता): बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 121 सीटों पर रिकॉर्ड 64.46% वोटिंग हुई है। यह मतदान प्रतिशत पिछले चुनावों के मुकाबले काफी अधिक है, जिससे सियासी गलियारों में हलचल बढ़ गई है। अगर 11 नवंबर को होने वाले दूसरे और आखिरी चरण की 122 सीटों पर मतदान का ट्रेंड ऐसा ही रहा, तो यह बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है।
17 चुनावों का ट्रेंड: मतदान बढ़ने पर सत्ता परिवर्तन
स्वतंत्रता के बाद हुए कुल 17 विधानसभा चुनावों के नतीजों से यह स्पष्ट होता है कि जब-जब बिहार में मतदान प्रतिशत 5 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा या घटा, तब-तब राज्य में न केवल सत्ता परिवर्तन हुआ, बल्कि सियासी दौर भी बदलते देखा गया।
- 1967: 7% मतदान बढ़ा, राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
- 1980: 6.8% मतदान बढ़ा, कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में लौटी।
- 1990: 5.8% मतदान बढ़ा, लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी और कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई।
लालू-राबड़ी राज का अंत और नीतीश का उदय
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार सत्ता तो नहीं, लेकिन सियासत पूरी तरह बदल सकती है। 2005 के विधानसभा चुनाव में 16.1% कम वोटिंग हुई थी, जिसके बाद लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन का अंत हुआ और बिहार को नीतीश कुमार के रूप में नया मुख्यमंत्री मिला। नीतीश कुमार ने सुशासन की छवि बनाकर पिछले 20 साल से बिहार की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी है।
