ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
शुकर है जिससे डरते थे वह नहीं हुआ और सब कुछ अमन चैन से निपट गया, शहर में हर चीज ठिकाने पर है। पुलिस की सख्ती ने तो असर दिखाया ही, अम्बेडकर मूर्ति विवाद को लेकर आंदोलन कर रहे भीम आर्मी और दीगर संगठनों द्वारा ऐन वक्त पर 15 अक्टूबर का कॉल वापस लेने से भी माहौल बदल गया और तनाव घुली फ़िजाँ में कुछ सुकून महसूस किया गया। तीन हजार जवानों की तैनाती और पचास जगह नाकेबंदी की दम पर 15 अक्टूबर का चुनौतीपूर्ण दिन तो शांति से बीत गया लेकिन इसे विवादों के समापन के बजाए युद्धविराम कहना ज्यादा मुफीद होगा, वजह यह कि हाईकोर्ट में अंबेडकर प्रतिमा लगाने के मसले पर आमने सामने आए दोनों पक्ष अभी भी अपने अपने नजरिए पर डटे हैं और मोर्चाबंदी जस की तस है। विचार से शुरू हुए इस विवाद ने अब खालिस जातिगत तेवर अपना लिए हैं।
अंबेडकर के खिलाफ ऐतराज भरे कमेंट्स करने के बाद दलित संगठनों के निशाने पर आए हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा अपने खिलाफ केस दर्ज होने के बाद खुद ही गिरफ्तारी देने पुलिस के पास पहुंचे तो लेकिन जांच चालू आहे, कहकर पुलिस ने थाने की चौखट पर आए आरोपी को गिरफ्तार करने से मना कर दिया। दरअसल, दो अप्रैल 2018 की जातीय हिंसा के बाद पुलिस ऐसे मामलों में फूंक फूंक कर कदम रखती आई है ताकि ये शहर अमन का बना रहे।
लेकिन यह भी सच है कि विवादों को लंबे समय तक नहीं खींचा जा सकता है, मतभेद अब मनभेद में बदल रहे है। हाईकोर्ट कैंपस से अंबेडकर प्रतिमा लगे अथवा नहीं और संविधान निर्माण में सर बीएन राऊ के योगदान को कितना स्वीकार्य या प्रतिष्ठा दी जाए, इन सवालों का जवाब शहर के ही लोगों को मिल बैठकर जल्द से जल्द निकाल लेना चाहिए। शायद ऐसे ही दिनों के लिए हबीब अमरोहवी ने लिखा है…बेहतर दिनों की आस लगाते हुए ‘हबीब’, हम बेहतरीन दिन भी गँवाते चले गए।
अनूप को पार्टी लाइन के उलट बोलने की चिंता नहीं
एक दौर था जब अनूप मिश्रा भाजपा की राजनीति में ग्वालियर चंबल इलाके में एक बड़े छत्रप की हैसियत रखते थे। कहा भी जाता है कि अटलजी के दौर में उनके लिए विधानसभा सीट पार्टी नहीं चुनती थी बल्कि वे खुद अपने लिए सीट चुनते थे। गिर्द से ऊब गए तो ग्वालियर दक्षिण आ गए और यहां भी उकता गए तो ग्वालियर पूर्व में ठिकाना बना लिया। विद्यायकी से जी भर गया तो मुरैना से सांसदी करने लगे।
हालांकि बेलागांव कांड के चलते मंत्रीपद से इस्तीफा देने के बाद अटलजी के जीवनकाल में ही उनकी सियासत हाशिए पर सिमटने लगी थी, चुनावी पुनर्जीवन के लिए लगातार दो बार भितरवार से ट्राई किया लेकिन पहली बार छह हजार तो दूसरी बार बारह हजार के अंतर से नाकाम रहे। यह सर्वविदित है कि जमीनी नेता की छवि रखने वाले अनूप पिछले चुनाव में ग्वालियर पूर्व लौटना चाहते थे लेकिन पार्टी ने आस पूरी नहीं की। अब जब तब अनूप की अपनी ही पार्टी से नाराजगी की अटकलें लगती रही हैं लेकिन वे अस्वस्थता के बावजूद पार्टी के कार्यक्रमों में नियमित हाजिरी भरते रहे, इसलिए ये अटकलें स्वत: ही खारिज हो गईं।
बहरहाल, यहां अनूप की व्यथा कथा इसलिए कि अब वाकई में उनके तेवर बदले बदले नजर आ रहे हैं। अभी दो रोज पहले उन्होंने सार्वजनिक मंच से भाषण में जातिगत जनगणना का यह कहते हुए विरोध किया कि मुझे मालूम है कि यह पार्टी लाइन के विपरीत है लेकिन अपने मन की बात कहने से नहीं हिचकेंगे, अनूप ने न सिर्फ अंबेडकर विरोधी बयान देने वाले एडवोकेट अनिल मिश्रा के बयान का अपनी असहमति के साथ जिक्र किया, दो अप्रैल के दंगों को याद किया बल्कि साढ़े तीन दशक पूर्व आरक्षण के विरोध में आत्मदाह करने वाले ग्वालियर के अखिलेश पाण्डे को भी सहानुभूति के साथ याद किया। सूत्र बताते है कि अनूप अब राजनीति से इतर ब्राह्मण नेता की पुरानी छवि को पुनर्जीवित करने की कवायद में हैं।
सिटिंग एमएलए को पसंद नही पूर्व विधायक कहलवाना
डॉ. सतीश सिकरवार दूसरी दफा ग्वालियर पूर्व विधानसभा सीट से विधायक बने हैं। विधानसभा सीट का नाम उनके लिए मुसीबत बन गया है। उन्हें इस बात का मलाल है कि वे जब अपनी विधानसभा सीट के नाम के उल्लेख के साथ परिचय देते हैं या चंबल से बाहर टोल नाकों पर विधानसभा से मिली आईडी दिखाते हैं तो उनके नाम के पीछे ग्वालियर पूर्व लिखा देख उन्हें पूर्व विधायक मान लिया जाता है, मजबूरी में उन्हें तमाम स्पष्टीकरण देना पड़ते हैं। एक कार्यक्रम में वे विधानसभा स्पीकर नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ मौजूद थे, वहीं पर उन्होंने स्पीकर से फरियाद कर दी कि वे चुनाव जीतने और सिटिंग एमएलए होने के बावजूद खुद को पूर्व विधायक कहलवाना नहीं चाहते।
सिंधिया के गढ़ में पटवारी…
कांग्रेस के सूबेदार जीतू पटवारी अब केंद्रीय मंत्री सिंधिया को उन्हीं के गढ़ में जाकर चुनौती दे रहे हैं। पटवारी ने इस बार सिंधिया के संसदीय क्षेत्र शिवपुरी का दौरा उसी दिन मुकर्रर किया, जब सिंधिया खुद यहां डेरा डाले हुए थे। पटवारी ने यहां किसान न्याय यात्रा में हिस्सा लिया तो वोट चोर गद्दी छोड़ अभियान में भी शिरकत की। इन आयोजनों में पटवारी के निशाने पर सिंधिया ही रहे, भाजपा पर भी तीखे प्रहार किए। खबर है कि पटवारी शिवपुरी के कांग्रेसजनो से 29 के चुनाव के लिए अभी से मजबूत चेहरा तलाश करने को कह गए हैं।
