पुताई का बदला ट्रेंड, महंगे पेंट और बढ़ती मजदूरी बिगाड़ रही लोगों का बजट

सिलवानी। दीपावली जैसे बड़े पर्व के पहले घरों की साफ-सफाई और पुताई की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन अब इस परंपरा में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां कच्चे मकानों में छुई (सफेद मिट्टी) और पक्के मकानों में चूना या डिस्टेंपर से कम लागत में पुताई कर ली जाती थी, वहीं अब लोग आधुनिक और आकर्षक लुक के लिए महंगे पेंट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बदलते ट्रेंड ने आम लोगों के बजट को बिगाड़ दिया है।

बाजार में 300 से 1000 रुपए लीटर तक के पेंट उपलब्ध हैं, जबकि डिस्टेंपर की कीमत अभी भी सस्ती है पांच लीटर लगभग 300 रुपए में मिल जाता है। लेकिन लोग अब इमल्शन और प्रीमियम पेंट की ओर ज्यादा झुकाव दिखा रहे हैं, जिससे पुताई का खर्च कई गुना बढ़ गया है। पेंट के साथ-साथ इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्रियों की कीमत भी आसमान छू रही है।

मजदूरी में भी बढ़ोतरी पेंट की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ पुताई करने वाले मजदूरों ने भी अपनी मजदूरी बढ़ा दी है। अब पेंटिंग का पूरा काम करवाने पर हजारों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। दुकानदारों के अनुसार इमल्शन पेंट की मांग तेजी से बढ़ी है, जो दिखने में तो आकर्षक होता है लेकिन काफी महंगा भी है।

छुई और चूना हुए अतीत की बात

कभी दीपावली से पहले गांवों में छुई की जबरदस्त मांग होती थी। बैलगाड़ियों में भरकर छुई बेचने वाले गांव-गांव जाते थे, लेकिन अब पक्के मकानों की संख्या बढ़ने और नए ट्रेंड के चलते यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है। छुई बेचने वाले लोग अब इस काम को छोड़कर अन्य व्यवसायों में लग गए हैं।

बदलते समय के साथ खर्च भी जरूरी

स्थानीय निवासी पुष्पेन्द्र शर्मा ने बताया कि पहले मकान की पुताई बहुत कम लागत में हो जाती थी, लेकिन अब हालात अलग हैं। महंगे पेंट और मजदूरी के चलते अब इसके लिए अलग से बजट बनाना पड़ता है। हालांकि, उनका मानना है कि अच्छे पेंट की उम्र ज्यादा होती है और यह कई सालों तक दोबारा पुताई की जरूरत नहीं पड़ने देता।

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