रक्षा उत्पादन में भारत की नई उड़ान

8 अक्टूबर बुधवार को देश में भारतीय वायु सेना दिवस मनाया गया. जाहिर है यह अवसर केवल हमारे सैनिक सामर्थ्य का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में हो रहे ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा उत्पादन मॉडल की वास्तविक परीक्षा का दिन भी था. आसमान में गरजते तेजस, राफेल और सुखोई लड़ाकू विमानों की उड़ानें न केवल शौर्य का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि भारत अब केवल “खरीदार देश” नहीं, बल्कि “निर्माता राष्ट्र” बनने की राह पर है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर 2014 में शुरू हुआ ‘मेक इन इंडिया’ अभियान अब रक्षा क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को छू रहा है. बीते एक दशक में भारत ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए हैं — विदेशी निर्भरता घटाने, निजी उद्योगों को अवसर देने और निर्यात बढ़ाने की दिशा में. यह परिवर्तन मात्र आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक है.

आज भारत की तीनों सेनाओं — थल, नौसेना और वायु सेना के आधुनिकीकरण का केंद्र स्वदेशी उत्पादन है. तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट , प्रलय और अग्नि मिसाइलें, अर्जुन टैंक, और एचएएल द्वारा विकसित हल्के हेलीकॉप्टर — यह सब उस आत्मनिर्भरता की झलक है जिसकी कल्पना दशकों से की जा रही थी. परंतु इस परिवर्तन की असली कसौटी अब है: क्या हम इसे स्थायी औद्योगिक क्षमता में बदल पा रहे हैं? वायु सेना दिवस का यह वर्ष इस मायने में खास है कि भारत ने रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड बढ़त हासिल की है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब ?21,000 करोड़ का रक्षा निर्यात किया, जो अब तक का सर्वोच्च आंकड़ा है. इससे स्पष्ट है कि भारत अब विश्व के टॉप 25 रक्षा निर्यातक देशों की सूची में अपनी जगह बनाने की दिशा में अग्रसर है.

इस सफलता के पीछे केवल सरकारी नीतियाँ नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी भी अहम है. टाटा, लार्सन एंड टुब्रो, महिंद्रा डिफेंस, और अदानी डिफेंस जैसी कंपनियाँ अब रक्षा विनिर्माण में ठोस योगदान दे रही हैं. सरकार ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में) स्थापित कर इस क्षेत्र में निवेश को नई गति दी है. इसके साथ ही, डिफेंस एक्सपो जैसे आयोजनों ने भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में एक नए विश्वसनीय साझेदार के रूप में प्रस्तुत किया है.

फिर भी चुनौतियां शेष हैं. अभी भी उन्नत जेट इंजन, रडार सिस्टम और उच्चस्तरीय इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में हम विदेशी सहयोग पर निर्भर हैं. “मेक इन इंडिया” की सच्ची सफलता तभी मानी जाएगी जब भारत अपने स्वदेशी इंजन, रडार और ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और निजी कंपनियों के बीच और गहरी साझेदारी की आवश्यकता है.

इस वर्ष का वायु सेना दिवस हमें याद दिलाता है कि आसमान की यह ऊंचाई केवल पराक्रम से नहीं, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता से संभव होती है. हमारे सैनिकों के साहस को जितनी आवश्यकता हथियारों की है, उतनी ही उन हथियारों के पीछे के स्वदेशी ज्ञान, नवाचार और उद्योग नीति की भी है.मेक इन इंडिया” रक्षा उत्पादन मॉडल अब केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता का आधार स्तंभ बन चुका है. यह वह चरण है जहाँ देश को ‘डिज़ाइन इन इंडिया’ की दिशा में भी कदम बढ़ाना होगा. क्योंकि आत्मनिर्भरता केवल निर्माण नहीं, बल्कि सृजन की भी प्रक्रिया है.

वायु सेना दिवस 2025 इस आत्मनिर्भर भारत की उस उड़ान का प्रतीक है, जिसमें पंख भी अपने हैं और दिशा भी अपनी. अब यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि इस उड़ान को और ऊंचा, और स्थायी बनाया जाए — ताकि आने वाले समय में भारत का आसमान पूरी तरह स्वदेशी विश्वास से भरा हो.

 

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