छिंदवाड़ा जिले में कोल्ड्रिफ कफ सिरप के सेवन से 11 बच्चों की हुई मौत ने पूरे प्रदेश को गहरे सदमे में डाल दिया है. इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि औषधि सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय प्रशासनिक निगरानी में कई गंभीर खामियां हैं. यह हादसा केवल एक जहरीले सिरप का परिणाम नहीं, बल्कि उन चूकों का भी परिणाम है जो समय रहते रोकी जा सकती थीं.
प्रदेश सरकार ने घटना को गंभीरता से लेते हुए कोल्ड्रिफ सिरप की बिक्री पर पूरे मध्यप्रदेश में तत्काल प्रतिबंध लगा दिया है. दवा प्रिसक्राइब करने वाले डॉक्टर को भी गिरफ्तार कर लिया गया है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने न केवल इस सिरप, बल्कि इसे बनाने वाली कंपनी श्रीसन फार्मा (कांचीपुरम, तमिलनाडु) के अन्य उत्पादों पर भी बैन लगाने का निर्देश दिया है. तमिलनाडु सरकार से प्राप्त जांच रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल की मात्रा 48.6 फीसदी तक पाई गई—जो किसी भी सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है. यही वह तत्व है जो बच्चों की किडनी को प्रभावित कर जानलेवा सिद्ध हुआ.केंद्र और राज्य स्तर पर कार्रवाई की गति भले ही तेज रही हो, लेकिन स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती पर सवाल उठना स्वाभाविक है. परासिया ब्लॉक में जब बच्चों में लगातार उल्टी, दौरे और किडनी फेल होने के लक्षण सामने आए, तब भी स्वास्थ्य अमले ने इसे सामान्य विषाक्तता समझकर शुरुआती जांच में देर की. यदि तत्काल सतर्कता दिखाई जाती और संदिग्ध सिरप को समय रहते प्रतिबंधित किया जाता, तो संभवत: इतनी जानें नहीं जातीं.
औषधि नियंत्रण विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. प्रदेश में बाजार में बिक रही दवाओं के नियमित सैंपल परीक्षण और क्वालिटी सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया अक्सर औपचारिक बनकर रह जाती है. छिंदवाड़ा जैसे जिलों में जहां दवा वितरण का नेटवर्क जटिल है, वहां निरीक्षण तंत्र की सक्रियता बेहद जरूरी है. लेकिन इस प्रकरण ने दिखाया कि निरीक्षण प्रणाली न तो नियमित है और न ही पर्याप्त रूप से सशक्त.तमिलनाडु के औषधि नियंत्रक ने कोल्ड्रिफ सिरप को अमानक घोषित करते हुए मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की है. वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एम्स नागपुर के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम भेजी है, जो नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर रही है. इन कदमों से स्पष्ट है कि मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं, बल्कि औषधि उत्पादन और वितरण की पूरी प्रणाली की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करता है.
मध्यप्रदेश के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने सभी जिलों के औषधि निरीक्षकों को कोल्ड्रिफ सहित श्री सन फार्मा की अन्य दवाओं की बिक्री तत्काल बंद करने के निर्देश दिए हैं. लेकिन यह कार्रवाई घटना के बाद आई—जब नुकसान हो चुका था. आवश्यकता इस बात की है कि राज्य में दवा परीक्षण प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाई जाए और प्रत्येक उत्पाद के लिए प्री-मार्केट वेरिफिकेशन की सख्त व्यवस्था हो.
यह घटना सिर्फ एक कंपनी या एक जिले की गलती नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रति लापरवाही की सामूहिक चेतावनी है. बच्चों की मौत से उपजा यह शोक एक स्थायी सबक बनना चाहिए—कि किसी भी औषधि को बाजार में पहुंचने से पहले उसकी शुद्धता, प्रमाणिकता और सुरक्षा सुनिश्चित हो. राज्य सरकार ने फिलहाल सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं, किंतु अब जरूरी यह है कि स्वास्थ्य एवं औषधि विभाग अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली में सुधार लाए. जनता के जीवन से जुड़ी ऐसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए—यही इस दु:खद घटना से निकला सबसे बड़ा सबक है.
