
सतना।भारतीय संस्कृति में “लीला“ केवल धार्मिक या पौराणिक कथा का मंचन नहीं, बल्कि लोकमानस का जीवंत उत्सव है। इसी प्रयास के साथ मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् नई दिल्ली एवं जिला प्रशासन सतना के सहयोग से 24 से 30 सितम्बर 2025 तक प्रतिदिन सायं 7 बजे से ‘’अन्तर्राष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव’’ का आयोजन श्रीराघव प्रयाग घाट, चित्रकूट में आयोजन किया गया है। इस सात दिवसीय प्रतिष्ठित आयोजन में सभी सादर आमंत्रित हैं। प्रवेश निःशुल्क है।
प्रथम प्रस्तुति इंडोनेशिया के कलाकारों ने नृत्यकृनाट्य रूप में प्रस्तुत की लीला इस प्रस्तुति का शीर्षक “सीता की खोज“ था, जिसका निर्देशन प्रो.देवी यूलियांति ने किया। 40 मिनट की इस रामलीला के बारे में प्रो.यूलियांति ने बताया कि रामायण भारत से धर्म और संस्कृति के साथ इंडोनेशिया पहुँची। इसका प्रमाण ‘ककविन रामायण’ नामक ग्रंथ से मिलता है, जो प्राचीन जावा भाषा में मध्य जावा स्थित मेदांग साम्राज्य (732-1006 ई.) के समय लिखा गया। इसके अतिरिक्त बाली का रामकवच भी इसका साक्ष्य है। बाद के काल में, इस कथा को पर्यटन को ध्यान में रखकर 1961 में जी.पी.एच. जति कुसुमो ने “सेंद्रातारी रामायण” (रामायण नृत्य-नाट्य) के रूप में प्रस्तुत किया। यह लीला नृत्यनाटिका के रूप में प्रस्तुत की गई। इस प्रस्तुति में इंडोनेशिया की संस्कृति और कला भी सौंदर्य स्वरूप में दर्शकों को देखने मिली। सीता जी के अपहरण से विचलित हुए श्रीराम सीता की खोज लीला में दिखाया गया कि रावण द्वारा सीता जी का अपहरण कर लिया जाता है। इस बात से श्रीराम विचलित हो जाते हैं। यहीं से सीता की खोज का क्रम प्रारंभ हो जाता है। लीला में सर्वप्रथम जटायु, रावण युद्ध दिखाया गया। इसके बाद श्रीराम, लक्ष्मण, जटायु संवाद दिखाया गया, जिसमें जटायु ने श्रीराम के साथ अपने पुराने संबंधों के बारे में बताया। इसके बाद रामलीला में हनुमान जी का प्रवेश, वानर सेना की तैयारी और लंका कूच प्रसंगों को दिखाया गया। यह लीला 40 मिनट की थी
द्वितीय प्रस्तुति सांस्कृतिक कला संगम नई दिल्ली के कलाकारों द्वारा लीला प्रस्तुति दी गई। श्री राम विवाह की कथा के अनुसार राजा जनक अपनी पुत्री सीता का विवाह भगवान राम से करवाने के लिए शिव धनुष को तोड़ने की शर्त रखते हैं। ऋषि विश्वामित्र के कहने पर भगवान राम स्वयंवर में जाते हैं और शिव धनुष को तोड़ते हैं और माता सीता स्वयंवर प्रसंग होता है। इसके बाद बताया कि श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास का कारण रानी कैकेयी का हठ था, जिसने राजा दशरथ से दो वरदान मांगकर श्रीराम को वनवास और अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजतिलक दिलाने की बात कही। प्रभु श्री राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए गंगा पार कर रहे होते हैं, तब केवट अपनी नाव में बिठाने से पहले राम के चरण धोना चाहता है। वह राम के चरणों की धूल के प्रभाव को जानता है, जो पत्थर को नारी बना सकती है, इसलिए वह डरता है कि लकड़ी की नाव भी स्त्री बनकर उड़ जाएगी. केवट की भक्ति और विनम्रता को देखकर, प्रभु राम उसकी इच्छा पूरी करते हैं, उसके श्रम को सम्मान देते हैं, और उसे दिव्य भक्ति का वरदान देकर उसकी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं यह सब देखकर दर्शक भाव विभोर हो गए।
इसी प्रकार 27 सितम्बर को विदेशी लीला-वियतनाम अनुसुइया उपदेश, पंचवटी प्रसंग, सीता हरण, जटायु वध, श्रीराम प्रतिज्ञा, 28 सितम्बर को शबरी प्रसंग, हनुमान मिलन, बालि वध, लंका दहन, विभीषण शरणागत, लक्ष्मण मूर्छा, रावण-अंगद संवाद, कुंभकरण वध, 29 सितम्बर को विदेशी लीला-मलेशिया मेघनाद वध, श्रीराम-लक्ष्मण हरण तथा 30 सितम्बर को हनुमान का पाताललोक मे प्रवेश, मकरध्वज संवाद, अहिरावण वध, रावण का उपदेश, श्रीराम-रावण युद्ध, रावण वध, श्रीराम राज्याभिषेक की प्रस्तुतियां दी जायेगी।
