मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल इंदौर का महाराजा यशवंतराव हॉस्पिटल — आज सिर्फ बीमारियों के इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि भयावह अव्यवस्था, लापरवाही और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया है. इस अस्पताल में दो नवजात शिशुओं को चूहों ने नोच-खाकर मार डाला. सोचिए, जिन मासूमों ने अभी सांस लेना सीखा भी नहीं था, वे इस दुनिया की निर्ममता का शिकार हो गए. यह घटना मात्र लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता का खुला अपमान और शिशु वध का जघन्य अपराध है.
करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद अगर अस्पतालों से गंदगी और चूहों का आतंक खत्म नहीं हो पा रहा, तो यह सवाल उठना लाजि़मी है कि आखिर वह पैसा गया कहां ? यह घटना महज प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि उस क$फन-खसोट व्यवस्था का वीभत्स चेहरा है, जिसमें गरीब की जिंदगी की कोई कीमत नहीं बची. विडंबना यह है कि इस वीभत्स हादसे पर समाज और राजनीति की चुप्पी सब कुछ बयान कर रही है. जिन संगठनों और दलों को सडक़ों पर उतरना चाहिए था, वे “पोहा-कचौरी” की राजनीति और जुलूसों में व्यस्त हैं. यह सवाल तो हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोरना चाहिए.
यह घटना मां अहिल्या की नगरी में हुई है, जहां करुणा और न्याय की परंपरा रही है. पर यहां न करुणा दिखी, न न्याय. सोचिए, अगर यही नवजात शिशु किसी मंत्री या बड़े अधिकारी के घर जन्मे होते और उनके साथ ऐसा हादसा होता, तो क्या व्यवस्था इतनी ही बेरुखी से चुप बैठी रहती ? निश्चित ही नहीं. यही इस व्यवस्था की सबसे घृणित विडंबना है—गरीब की मौत को आंकड़ों और मुआवज़े में समेट दिया जाता है.
महाराजा यशवंतराव हॉस्पिटल की दुर्दशा कोई नई बात नहीं.चूहों और गंदगी की शिकायतें वर्षों से उठती रही हैं. करोड़ों रुपये की योजनाओं, सफाई बजट और दिखावटी सुधारों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है. यहां भर्ती होना, मानो मौत को गले लगाने जैसा है. यहां आने वाला हर गरीब मरीज यह जानता है कि इलाज से ज्यादा खतरा उसे अस्पताल की गंदगी, संक्रमण और लापरवाही से है. सवाल उठता है कि जब जान बचने की कोई गारंटी नहीं, तो यह सरकारी अस्पताल आखिर किसके लिए है ? और जो पैसा इसके रखरखाव के नाम पर खर्च होता है, वह किसकी जेब में जा रहा है ?
इस हादसे ने स्पष्ट कर दिया है कि व्यवस्था की उदासीनता, प्रशासन की संवेदनहीनता और समाज की चुप्पी—इन तीनों ने मिलकर मासूमों की बलि चढ़ाई है. आज भी संबंधित अधिकारियों और प्रबंधन पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं हुई. यही असली अपराध है. अगर इस घटना पर जिम्मेदारों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं होता, तो यह संदेश जाएगा कि इस देश में गरीबों और नवजात मासूमों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं.
यह कहना गलत नहीं होगा कि अब उम्मीद न प्रशासन से है, न सिस्टम से. न्यायालय या ईश्वर ही शायद इस व्यवस्था को झकझोर सकते हैं. लेकिन क्या समाज इतनी देर तक चुप रहेगा ?
अगर हम आज आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो कल और मासूम इस काली व्यवस्था के शिकार होंगे.
यह घटना सिर्फ एक अस्पताल की विफलता नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर कलंक है. यह हमें याद दिलाती है कि जब तक जिम्मेदारों पर कठोर आपराधिक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह व्यवस्था नहीं सुधरेगी. संवेदनहीन नौकरशाही और भ्रष्ट तंत्र को तभी झटका लगेगा जब समाज सडक़ों पर उतरेगा और न्यायालय सख्त रुख अपनाएगा.
इसलिए अब सवाल पूछने का समय है—क्या इस देश में गरीब की जिंदगी की कोई कीमत नहीं ? क्या सरकार सिर्फ बड़े लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी देगी, और गरीब को मरने के लिए छोड़ देगी ? अगर सचमुच ऐसा है, तो यह लोकतंत्र नहीं, निर्मम तंत्र है.
महाराजा यशवंतराव हॉस्पिटल की दीवारों में गूंजती मासूमों की चीख आज हमसे यही सवाल पूछ रही है. यदि हमने इसे अनसुना कर दिया, तो कल हमारी संवेदनहीनता ही सबसे बड़ा अपराध मानी जाएगी.
