त्रिपुरा सरकार 2017 की भर्ती प्रक्रिया को 2 से 4 महीने में पूरी करे- उच्चतम न्यायालय

अगरतला, 30 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने त्रिपुरा सरकार को 2017 की भर्ती प्रक्रिया को 2 से 4 महीने में पूरा करने का निर्देश दिया है। देश की शीर्ष अदालत ने त्रिपुरा सरकार को विभिन्न श्रेणियों के उन 537 पदों की भर्ती प्रक्रिया को पूरा करने को कहा है जिसे 2018 में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता में आने के बाद रोक दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने भर्ती प्रक्रिया में उन मूल नियमों का कड़ाई से पालन करने को कहा है जो नौकरी के विज्ञापन जारी होने के समय लागू थे। यह मामला त्रिपुरा स्टेट राइफल्स (टीएसआर) में नामांकित (ग्रुप-डी), बॉयलर इंस्पेक्टर और त्रिपुरा सिविल सेवा/पुलिस सेवा (टीसीएस/टीपीएस) में 506 अधिकारी पदों के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों द्वारा लाया गया था।

इस संबंध में उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और राजेश बिंदल की पीठ ने दो दिन पहले दिए अपने फैसले में भर्ती प्रक्रिया को बीच में ही रद्द करने और 2018 की भर्ती नीति के तहत नई प्रक्रिया शुरू करने के राज्य के फैसले को उलट दिया है।

भर्ती प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी। लेकिन विधानसभा चुनावों के कारण वाम मोर्चा सरकार इसे अंतिम रूप नहीं दे पाई। मार्च 2018 में मुख्यमंत्री बनने के बाद बिप्लब कुमार देब ने नामांकित अनुयायियों की भर्ती पर रोक लगा दी। जिसके नियम त्रिपुरा राज्य राइफल्स अधिनियम, 1983 और टीएसआर भर्ती नियम, 1984 द्वारा बनाए गए थे।

शीर्ष अदालत ने पाया कि भर्ती प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में थी। साक्षात्कार के परिणामों की घोषणा बाकी थी। जिसे लटका दिया गया और अगस्त में एक आदेश के जरिये इसे रद्द कर दिया गया।

भर्ती प्रक्रिया से प्रभावित उम्मीदवारों ने पहले उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने राज्य सरकार के फैसले का समर्थन किया। अंतत: याचिकाकर्ताओं ने मामले को शीर्ष अदालत में उठाया, जिसने उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया।

शीर्ष अदालत का आदेश है कि नामांकित अनुयायियों और बॉयलर निरीक्षकों के लिए स्थगित भर्ती प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी की जाए। जबकि टीसीएस और टीपीएस पदों को चार महीने के भीतर अंतिम रूप दिया जाए। अदालत ने भर्ती प्रक्रिया में उन मूल नियमों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है जो नौकरी के विज्ञापन जारी होने के समय लागू थे। पीठ ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 166(1) के तहत कार्यकारी निर्देश स्थापित कानूनों और उनसे संबंधित नियमों का स्थान नहीं ले सकते।

 

 

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