सोमवार को हुई रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातचीत ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई स्पष्ट संकेत छोड़े. पुतिन ने मोदी को सीधे अलास्का में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हुई अपनी वार्ता की जानकारी दी. यह दर्शाता है कि रूस भारत को केवल “सहयोगी” नहीं, बल्कि “रणनीतिक भरोसेमंद साझेदार” मानता है. इस बातचीत में
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु रहा,यूक्रेन युद्ध. प्रधानमंत्री मोदी ने दो टूक कहा कि युद्ध बंद होना चाहिए. यह संदेश केवल रूस के लिए नहीं था, बल्कि उन पश्चिमी ताकतों के लिए भी था जो शांति का ढोंग करते हुए हथियारों की आपूर्ति कर इस युद्ध को लंबा खींच रहे हैं. अमेरिका और यूरोप का असली चेहरा यही है—वे लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों की बातें करते हैं, लेकिन हथियार उद्योग की तिजोरियां भरने के लिए संघर्ष को जिंदा रखते हैं.
भारत की यह सा$फ नीति है कि किसी भी संघर्ष का हल बातचीत और कूटनीति से निकलेगा, न कि पश्चिमी ताकतों की सैन्य हवस से. यही वजह है कि मोदी ने विश्व मंच से लेकर द्विपक्षीय वार्ताओं तक बार-बार यही रुख दोहराया है. यह साहस किसी पश्चिमी देश ने नहीं दिखाया. अमेरिका की नीति
साफ है कि “अपना हित पहले, बाकी सब बाद में. लेकिन भारत का संदेश है,विश्व शांति पहले, और भारत का हित उसी में सुरक्षित. भारत और रूस
द्विपक्षीय सहयोग की चर्चा में भी एक तीखा संकेत छिपा है. जब पश्चिम रूस पर प्रतिबंधों की दीवार खड़ी कर उसे अलग-थलग करने में लगा है, भारत ऊर्जा, रक्षा और तकनीकी साझेदारी के जरिए यह जता रहा है कि उसकी विदेश नीति किसी ब्लॉक की गुलाम नहीं है. भारत न तो अमेरिका का पिछलग्गू है, न ही यूरोप की कठपुतली.
आज का यथार्थ यह है कि अमेरिका और यूरोप के दोहरे मानदंड अब उजागर हो चुके हैं. इराक, अफगानिस्तान और लीबिया को बर्बाद करने वाले वही देश अब यूक्रेन के नाम पर “मानवता” का उपदेश दे रहे हैं. चीन की विस्तारवादी चालों पर उनकी चुप्पी और रूस के खिलाफ उनकी चीख—इनके पाखंड को और उजागर करती है.
ऐसे माहौल में भारत की आवाज़ विश्व राजनीति का संतुलन बनकर उभर रही है. पुतिन का मोदी से संवाद करना इस बात की गवाही है कि अब पश्चिम चाहे जितनी शोर-शराबा करे, वैश्विक समीकरण में भारत को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. कुल मिलाकर भारत अब न सि$र्फ विश्व राजनीति में मध्यस्थ है, बल्कि नैतिक नेतृत्व का प्रतीक भी है. पश्चिमी हथियार उद्योग की लूट और अमेरिकी दबाव की राजनीति के बीच भारत का यह साहसिक संदेश—”युद्ध बंद हो, शांति शुरू हो”—आने वाले वर्षों में नई विश्व व्यवस्था की आधारशिला साबित हो सकता है.
दरअसल आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ रही है. अमेरिका और यूरोप की भूमिका अब पहले जैसी सर्वशक्तिमान नहीं रही. चीन अपनी आक्रामक रणनीति से वैश्विक चिंता का विषय है. ऐसे समय में भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” (स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी ) ही उसकी सबसे बड़ी ता$कत है. पुतिन-मोदी वार्ता इसी स्वायत्तता का प्रतीक है कि जहां भारत रूस से संवाद करता है, अमेरिका से सहयोग करता है और यूरोप से साझेदारी निभाता है, लेकिन किसी खेमे में बंधा हुआ नहीं दिखता.
