टैरिफ की चुनौती, एक बड़ा अवसर भी !

अमेरिका द्वारा भारत पर लगाया गया 50 फीसदी टैरिफ,जिसमें 25 फीसदी सामान्य शुल्क और 25 फीसदी रूस से तेल खरीदने पर दंडस्वरूप शुल्क शामिल है,द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर गहरा असर डाल सकता है. यह कदम न केवल डब्ल्यूटीओ के मूल व्यापार सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता और रणनीतिक निर्णयों पर हस्तक्षेप का भी एक असफल प्रयास है.

अमेरिका का तर्क है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदकर रूस की अर्थव्यवस्था को मज़बूती दे रहा है, लेकिन यह एकपक्षीय दृष्टिकोण है. भारत स्पष्ट कर चुका है कि उसकी ऊर्जा नीति उसके राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, न कि किसी ब्लॉक की अपेक्षाओं पर. भारत ने बार-बार दोहराया है कि वह यूक्रेन युद्ध में शांति और संवाद का समर्थक है, लेकिन किसी के दबाव में आकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता.इस टैरिफ का सबसे अधिक असर भारत के उन श्रम प्रधान निर्यात क्षेत्रों पर पड़ेगा जो अमेरिका को भारी मात्रा में निर्यात करते हैं—जैसे कि रत्न व आभूषण, कपड़ा, चमड़ा और समुद्री खाद्य. ये क्षेत्र देश की निर्यात अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका इन्हीं पर टिकी है. इस पूरी परिस्थिति में जिस चीज़ ने भारत को विचलित नहीं होने दिया, वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शांत, दृढ़ और दूरदर्शी नेतृत्व. मोदी न तो जल्दबाज़ी में प्रतिक्रिया देने वाले नेता हैं, न ही झुकने वाले. उन्होंने इस चुनौती को “संकट नहीं, अवसर” की दृष्टि से देखा है—जो आज की वैश्विक राजनीति में एक दुर्लभ विशेषता बन गई है.प्रधानमंत्री मोदी का विश्वास है कि जब एक दरवाज़ा बंद होता है, तो भारत अपने दम पर सौ और दरवाज़े खोल सकता है. उनकी “वसुधैव कुटुंबकम्” की नीति वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज़ को नई प्रतिष्ठा दिला रही है, और यह संकट उन्हें और अधिक मुखर बना रहा है.वर्तमान सरकार पहले से ही ‘मेक इन इंडिया’, ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’, ‘पीएलआई योजना’ जैसे उपायों के माध्यम से उत्पादन और निर्यात को विविधतापूर्ण और प्रतिस्पर्धी बना रही है. मोदी के नेतृत्व में भारत अब सिंगापुर, यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका जैसे नए बाजारों में व्यापारिक संधिया करने के लिए तत्पर है, ताकि अमेरिकी निर्भरता को रणनीतिक रूप से संतुलित किया जा सके.यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी व्यक्तिगत रूप से वैश्विक राजनयिक संबंधों में विश्वास रखते हैं. उन्होंने जी 20 की अध्यक्षता से लेकर ब्रिक्स और एससीओ के मंचों तक भारत की संप्रभु आवाज को मजबूती दी है. उनका यह आत्मविश्वास और वैश्विक सोच ही है कि वे अमेरिका को आंखों में आंखें डालकर अपनी नीति समझा सकते हैं, और साथ ही घरेलू उद्योग को नए अवसरों के लिए प्रेरित कर सकते हैं.दरअसल, यह टैरिफ संकट एक साधारण व्यापारिक विवाद नहीं है,यह भारत की रणनीतिक संप्रभुता, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, और वैश्विक कूटनीतिक प्रतिष्ठा की परीक्षा है. लेकिन इस संकट में देश को कोई संदेह नहीं कि भारत न केवल इस चुनौती से उबरेगा, बल्कि एक नई व्यापारिक, कूटनीतिक और औद्योगिक रणनीति के साथ और अधिक सशक्त होकर उभरेगा.अमेरिका को यह समझना होगा कि 21वीं सदी का भारत एक नवोन्मेषी, निर्णायक और राष्ट्रीय स्वाभिमान से भरा हुआ राष्ट्र है, जो दबाव में नहीं, केवल संवाद में विश्वास करता है.

 

 

 

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