श्रीनगर, 07 अगस्त (वार्ता) कश्मीर के प्रमुख मौलवी और हुर्रियत अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने गुरुवार को कहा कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने से ऐतिहासिक तथ्य और कश्मीर के लोगों की जीवंत स्मृतियों को मिटाया नहीं जा सकता है।
मीरवाइज़ जम्मू-कश्मीर सरकार की उस अधिसूचना पर प्रतिक्रिया दे रहे थे जिसमें मशहूर लेखकों अरुंधति रॉय और ए.जी. नूरानी की रचनाओं सहित 25 किताबों को ‘ज़ब्त’ की श्रेणी में डाल दिया गया था। अधिसूचना में आरोप लगाया गया है कि ये किताबें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं, आतंकवाद का महिमामंडन करती हैं, अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं और युवाओं को कट्टरपंथी बनाती हैं।
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश पर गृह विभाग ने पांच अगस्त को जो अधिसूचना जारी की थी उसमें कहा गया है, “ये किताबें अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं और भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालती हैं, इसलिए इन पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152, 196 और 197 के प्रावधान लागू होते हैं।”
मीरवाइज ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि विद्वानों और प्रतिष्ठित इतिहासकारों की किताबों पर प्रतिबंध लगाने से ऐतिहासिक तथ्य और कश्मीर के लोगों की जीवंत स्मृतियों को मिटाया नहीं जा सकता। यह सत्ता में बैठे लोगों की असुरक्षा और सीमित समझ को उजागर करता है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने इस आदेश को “लोकतांत्रिक अधिकारों और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर एक सत्तावादी हमला” करार दिया है। एक सोशल मीडिया पोस्ट में माकपा ने कहा कि भाजपा ने अनुच्छेद 370 को समाप्ति की छठी वर्षगांठ पर, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल के अधीन गृह विभाग ने 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया है। यह लोकतांत्रिक अधिकारों और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर एक सत्तावादी हमला है।
गौरतलब है कि जिन किताबों को ज़ब्त की श्रेणी में डाला गया है, उनमें संविधान विशेषज्ञ ए.जी. नूरानी की “कश्मीर: द कश्मीर डिस्प्यूट 1947-2012”, सुमंत्र बोस की “कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स एंड कॉन्टेस्टेड लैंड्स”, डेविड देवदास की “इन सर्च ऑफ़ अ फ्यूचर: द कश्मीर स्टोरी”, अरुंधति रॉय की “आज़ादी, ए डिसमेंटल्ड स्टेट: अनुराधा भसीन की “द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370”, तारिक अली, पंकज मिश्रा और अन्य की “कश्मीर द केस फॉर फ़्रीडम”, क्रिस्टोफर स्नेडेन की “इंडिपेंडेंट कश्मीर”, और इमाम हसन अल-बन्ना की “मुजाजिद की अज़ान” शामिल है।
