ऑनलाइन गेमिंग की बच्चों पर काली छाया

इंदौर में हाल ही में घटित एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है. महज़ 12 वर्ष का एक बालक, जिसने अभी जीवन की दहलीज़ पर कदम ही रखा था, ऑनलाइन गेमिंग में ?3000 हारने के बाद आत्महत्या जैसा भयावह निर्णय ले बैठा. यह बालक 8वीं कक्षा में पढ़ता था और अपनी माँ के मोबाइल फोन पर गेम खेलते हुए यह रकम गंवा बैठा था. जब माँ को पैसों के लेन-देन की जानकारी मिली, तो डाँट की आशंका और अपराधबोध ने उसे इस कदर घेर लिया कि उसने आत्मघाती कदम उठा लिया. दुखद विडंबना यह है कि उस मासूम का जन्मदिन मात्र एक दिन पहले ही पूरे परिवार ने हर्षोल्लास से मनाया था.

यह अकेली घटना नहीं है. भारत में ऑनलाइन गेमिंग, विशेषकर पैसे आधारित गेम, बच्चों और किशोरों को मानसिक रूप से जकड़ते जा रहे हैं. एक अन्य हृदयविदारक घटना उत्तर प्रदेश के आगरा से सामने आई थी, जहाँ 16 वर्षीय एक किशोर ने ?40,000 की ऑनलाइन गेमिंग में हानि के बाद आत्महत्या कर ली थी. इसी तरह छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक 13 साल के बच्चे ने बार-बार हारने के कारण फाँसी लगा ली थी. ये घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं — ये एक नई सामाजिक महामारी का संकेत बन गई हैं.

बिना किसी नियमन के संचालित होने वाले ये गेम्स आज के बच्चों के लिए एक डिजिटल ड्रग बनते जा रहे हैं. गेमिंग कंपनियाँ मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों की आदतों, भावनाओं और प्रतिस्पर्धात्मक भावना का दोहन करती हैं. एक ओर, ये गेम्स लगातार रिवाड्र्स और इंस्टंट कैश के ज़रिए उन्हें बाँधते हैं, वहीं दूसरी ओर हार की स्थिति में पैदा होने वाला आत्मग्लानि, डर और कुंठा बच्चों को अवसाद और आत्मघात जैसे अतिवादी रास्तों पर ले जाता है.

बच्चे के मोबाइल उपयोग पर पूरी तरह से रोक संभव नहीं, लेकिन सतर्कता ज़रूरी है. माँ-बाप को केवल डाँटने की भूमिका से बाहर निकलकर संवाद और मार्गदर्शन की भूमिका अपनानी होगी. बच्चों को यह सिखाना होगा कि हार-जीत ज़िंदगी का हिस्सा है, और गलती करना अपराध नहीं. मोबाइल की पासवर्डिंग या फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन्स पर नियंत्रण जैसी तकनीकी सावधानियाँ भी ज़रूरी हैं.

सरकार ने कुछ कदम ज़रूर उठाए हैं. हाल ही में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने कुछ रियल मनी गेमिंग एप्स और पोर्नोग्राफी से संबंधित सामग्री को प्रतिबंधित किया है. परंतु बच्चों के लिए आकर्षक, हिंसात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसानदायक गेमिंग ऐप्स को लेकर ठोस कानून, उम्र आधारित नियंत्रण और अभिभावकों के लिए दिशा निर्देश समय की माँग हैं.

हर बार जब हम इस तरह की ख़बर पढ़ते हैं, तो हमें यह आत्मावलोकन करना चाहिए कि क्या हम अपने बच्चों को केवल डाँटकर, मोबाइल छीनकर या चुप करा कर उनकी समस्याओं को हल कर पा रहे हैं? या फिर हमें उनके साथ बैठकर बात करने, उनकी भावनाओं को समझने और उन्हें डिजिटल युग की सकारात्मकता से जोडऩे की ज़रूरत है?

यह केवल आत्महत्या की एक दुखद घटना नहीं है, यह एक चेतावनी है — कि कहीं हम अपने बच्चों को हार के डर में जीना तो नहीं सिखा रहे? कुल मिलाकर यह एक गंभीर और संवेदनशील विषय है. इस पर व्यापक जन जागरण जरूरी है. इस संदर्भ में केवल सरकारी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं, पारिवारिक जागरूकता, खास तौर पर माता-पिता का सतर्क रहना बेहद ज़रूरी है. बच्चों को मोबाइल गेम की बजाय मैदानी खेलों की आदत डालना एक बेहतर उपाय हो सकता है.

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