ऑपरेशन सिंदूर : न्यायिक संकल्प की अवधारणा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लोकसभा में अपने भाषण के माध्यम से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विपक्ष के सवालों का जोरदार खंडन किया. उन्होंने भारत की बदलती सैन्य और रणनीतिक सोच का एक व्यापक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया. यह भाषण सिर्फ एक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति और आतंकवाद के खिलाफ ‘न्यायिक प्रतिशोध’ के सिद्धांत की वैचारिक पुष्टि थी.

विपक्ष ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर सवाल उठाते हुए इसे “चुनावी स्टंट”, “संवैधानिक प्रक्रिया से बाहर की सैन्य कार्रवाई” और “लोकतांत्रिक जवाबदेही से विमुख” करार दिया. उन्होंने पूछा कि क्या संसद को पहले विश्वास में लिया गया था, क्या कूटनीतिक विकल्प समाप्त हो गए थे और क्या भारत अब जवाबी प्रतिशोध के रास्ते पर चल पड़ा है.

इन सवालों को अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक गलियारों में घसीटने के प्रयास के रूप में देखा गया. इस पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री का भाषण एक स्पष्ट संदेश था कि भारत अब पुरानी ‘सहिष्णुता की परिभाषाओं’ में बंधा नहीं रहेगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष के हर आरोप का तथ्यात्मक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर करारा जवाब दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ कोई आकस्मिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि महीनों की खुफिया तैयारी, अंतर-मंत्रालयी समन्वय और रणनीतिक परिपक्वता का परिणाम था. उन्होंने कहा, “हमने पहले शांति का हाथ बढ़ाया, लेकिन जब निर्दोषों का रक्त बहा, तो भारत मौन नहीं रह सकता.” जाहिर है संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पालन पर प्रधानमंत्री ने जोर दिया. उन्होंने संसद को जानकारी देने की प्रक्रिया को अनिवार्य बताते हुए कहा, “इस सदन का सम्मान करते हुए मैं स्वयं उपस्थित हूँ. यह सरकार जवाबदेह है और हर प्रश्न का उत्तर देने को तत्पर है. दरअसल, सरकार ने ‘प्रतिशोध’ नहीं, बल्कि ‘न्यायिक संकल्प’ की अवधारणा को परिभाषित किया है. यह प्रतिघात आतंकवाद के विरुद्ध था, किसी धर्म, राष्ट्र या समूह के विरुद्ध नहीं. प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारे लक्ष्य आतंक के अड्डे हैं, निर्दोषों पर आक्रमण नहीं . हम सीमा पार जाकर आतंक के आकाओं को यह संदेश दे चुके हैं कि भारत अब चुप नहीं रहेगा. प्रधानमंत्री का वक्तव्य यह भी दर्शाता है कि भारत अब ‘रणनीतिक धैर्य’ के स्थान पर ‘सक्रिय रक्षा’ की नीति अपनाने को तत्पर है. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत की सैन्य क्षमताओं, विशेष बलों की दक्षता और खुफिया तंत्र की परिपक्वता का भी प्रमाण है. यह देश की उस ‘न्यू नॉर्मल’ की अभिव्यक्ति है जो उरी और बालाकोट के बाद भारत ने सैन्य रणनीति के रूप में अपनाई है.

बहरहाल,लोकतंत्र में प्रश्न पूछना आवश्यक है, लेकिन जब प्रश्न राजनीतिक पूर्वग्रह से प्रेरित हों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर धुंध पैदा करें, तब उत्तर केवल भाषण नहीं होता—उत्तर होता है नेतृत्व शक्ति और प्रामाणिकता. प्रधानमंत्री मोदी ने मंगलवार के अपने भाषण में यह सिद्ध कर दिया कि भारत का नेतृत्व अब न तो अनिर्णय में डगमगाता है और न ही अंतरराष्ट्रीय आलोचना के भय से अपने संकल्प को शिथिल करता है. दरअसल,ऑपरेशन सिंदूर’ कोई एक सैन्य अभियान भर नहीं था. यह भारत की आत्मा पर लगे आघात का उत्तर था,संयम और निर्णायकता के साथ. लोकसभा में प्रधानमंत्री का उत्तर उस चेतना का राजनीतिक अनुवाद था जो अब भारत की नई पहचान बन रही है कि,शांति की आकांक्षा, लेकिन आत्मरक्षा में असंदिग्ध प्रहार.

 

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