द्वापर युग का है पंचदेवलिया महादेव मंदिर

सुसनेर:द्वापर युग में पांडवों ने वनवास के दौरान कई शिवालयों की स्थापना की थी, जिनका जिक्र धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है. महाभारत के अनुसार पांच पांडव अपनी माता कुंती के साथ वन में विहार करते हुए ग्राम देहरिया और मेना के बीच स्थित जंगल में पहुंचे थे. यहां पर हिडम्ब नामक राक्षस और उसकी बहन हिडिम्बा रहती थी. चूंकि यह क्षेत्र विध्यांचल पर्वत श्रृंखला के रूप में जाना जाता है. इसलिए यहां पर पांडवों ने गुफाएं बनाई और निवास स्थान चुना. फिर एक ही लाल रंग की शिलालेख से मंदिर का निर्माण किया है, जिसमें विराजित शिवलिंग पंचदेवलिया महादेव के नाम से विख्यात है.

यहां पर रूके रहने के लिए भीम ने हिडम्ब राक्षस का वध कर उसकी बहन हिडिम्बा से भी विवाह किया था. मान्यता है कि यही पर घटोत्कच्छ का जन्म हुुआ था. इसलिए इस स्थान को घटोत्कच्छ की जन्म स्थली भी कहा जाता है. सावन में यह मंदिर श्रृद्धालओं की आस्था का केन्द्र बना हुआ है. यह मंदिर आगर मालवा जिले के सुसनेर तहसील में नगर से करीब 10 किलोमीटर पश्चिम दिशा में विध्यांचल पर्वतमाला पर स्थित है. कहा जाता है कि औरंगजेब ने इस मंदिर पर भी हमला किया था. जिसका निशान आज भी मौजूद है. श्रद्धालु इस इस स्थान को शिवजी के तीसरे नेत्र के रूप में मानकर पूजा करते आ रहे हैं. इस मंदिर का उल्लेख शिव पुराण में भी मिलता है.

गुफाओं का आज तक नहीं जान पाया कोई रहस्य

मंदिर के आसपास कुछ छोटी-बड़ी गुफाएं भी हैं, कोई कहता है कि एक गुफा का रास्ता उज्जैन में जाकर खुलता है. पहले इसी गुफा से साधु-संत सिंहस्थ में पहुंचा करते थे. किन्तु इस बात का कोई प्रमाण किसी के भी पास मौजूद नहीं है. नवभारत टीम ने एक दो गुफाएं देखी भी, लेकिन अंधेरा काफी होने के कारण कुछ पता नहीं चल पाया. यही कारण है कि आज तक कोई भी इन गुफाओं का रहस्य नहीं जान पाया है. एक गुफा पांडवों ने यहां निवासरत रहने के लिए भी बनाई थी. एक गुफा मंदिर के दांयी और बनी हुई है, जिसमें भीम शिव उपासना करता था.

साधु संतों की है तपस्या स्थली…

सालों से यहां महाशिवरात्रि पर एक दिनी मेले का आयोजन किया जाता है. पिछले कुछ वर्षों से चित्रकुट के साधु-संत यहां रहकर शिव आराधना कर रहे हैं. प्रति वर्ष सावन माह में हजारों की संख्या में श्रृद्धालु दर्शन करने दूर-दूर से पहुंचते हैं. बीते कई सालों से नगर के शिवशक्ति कांवड़ यात्रा संघ के द्वारा भी जिले की सबसे बड़ी कांवड़ एवं कलश यात्रा निकाली जाती है. 30 ग्रामों के ग्रामीणों की समिति बनी हुई है, जो मंदिर की व्यवस्थाओं का सुचारू संचालन करती है. इस समिति ने प्रतिदिन भजन-कीर्तन करके मंदिर के आसपास होने वाली आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगा दी है.

पहाड़ी से दिखाई देता है प्रकृति का नजारा…

वर्षा ऋतु में पहाड़ी से देखने पर प्रकृति का सुंदर दृश्य दिखाई देता है. चारों ओर पहाडिय़ां और फसलों से लहलहाते खेत दिखाई देते हैं. एक तरफ सुसनेर, तो दूसरी तरफ काल्वा बालाजी मंदिर भी दिखाई देता है. ऐसा लगता है मानो हम साक्षत प्रकृति के सुंदर स्वरूप के दर्शन कर रहे हों.

महाकाल के स्वरूप में शिवलिंग…

आमतौर पर शिवालयों में शिवलिंग गोलाकार ही होते हैं. किन्तु पंचदेहरिया महादेव मंदिर में स्थित इस शिवलिंग का स्वरूप उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की भांति दिखाई देता है. कहा जाता है साल में एक बार शिवलिंग तिल के समान बढ़ता है. शिवलिंग में नीचे की ओर पीतल का कवच चढ़ा हुआ है.

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