जम्मू, 21 जुलाई (वार्ता) गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने सोमवार को कहा कि आज विश्व आतंकवाद, संघर्षों और युद्धों की आग में जल रहा है और पूरी दुनिया मानो बारूद के ढेर पर बैठी है लेकिन इन तमाम भयावह समस्याओं का प्रभावी समाधान वेदों में मौजूद है।
श्री देवव्रत जम्मू शहर के शेर-ए-कश्मीर विश्वविद्यालय परिसर के खचाखच भरे बाबा जित्तो सभागार में आयोजित भव्य समारोह को संबोधित कर रहे थे। यह कार्यक्रम आर्य प्रतिनिधि सभा, जम्मू-कश्मीर द्वारा आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती एवं आर्य समाज की 150वीं स्थापना वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया।
राज्यपाल ने कहा कि यह हम सभी के लिए गर्व का विषय है कि गत दो वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में आर्य समाज से जुड़े कार्यक्रमों की श्रृंखला प्रारंभ हुई है। इन आयोजनों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित अनेक विशिष्ट जनों की सहभागिता रही है। ये कार्यक्रम आर्य प्रतिनिधि सभाओं और सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभाओं द्वारा आयोजित किए जा रहे हैं, जो वैदिक पथ पर चलने वालों में नई ऊर्जा का संचार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जब स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ, तब देश की जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी। उस समय उन्होंने अकेले ही रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, आडंबर और पाखंड के विरुद्ध सशक्त आंदोलन छेड़ा। उस काल में वेदों पर मानो धूल जम चुकी थी, जिसे स्वामी दयानंद ने झाड़कर मानवता को पुनः वेदों से परिचित कराया। उनके इस कार्य के फलस्वरूप गुरुदत्त विद्यार्थी, स्वामी श्रद्धानंद, पंडित लेखराम जैसे तेजस्वी वैचारिक योद्धाओं की नई पीढ़ी भारतवर्ष में जन्मी।
राज्यपाल ने कहा कि आज विश्व में यह सोच पनप रही है कि केवल हमारा ही मत सही है, बाकी सब असत्य हैं। यही संकीर्ण मानसिकता वैश्विक संघर्षों का मूल कारण बन गई है। जबकि वेद समस्त मानवता के कल्याण के लिए हैं, न कि किसी विशेष भूभाग के लोगों के लिए। और इन्हीं वेदों से हमें परिचित कराने वाले एकमात्र महापुरुष थे स्वामी दयानंद।
उन्होंने चिंता जताई कि आज वेदों का ज्ञान तो है, परंतु हम उसे अपने आसपास और विश्व में प्रसारित नहीं कर पा रहे हैं। यदि यह ज्ञान हमारे साथ ही समाप्त हो गया, तो आने वाली पीढ़ियों तक यह कैसे पहुंचेगा? यह ज्ञान तभी सार्थक है जब इसे बांटा जाए। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत प्रसिद्ध वैदिक मंत्र से की “ॐ असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय” और कहा कि यह वैदिक संदेश आज के विषम समय में भी संपूर्ण मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
