भोपाल। अवधपुरी में चल रहे चातुर्मास में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि उदासी कोई मानसिक रोग नहीं, बल्कि हमारे मोह, अपेक्षाओं और अभिमान का परिणाम है। उन्होंने कहा कि संसार में सुख-दुःख का चक्र निरंतर चलता है। ज्ञानी व्यक्ति इन परिवर्तनों से विचलित नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि कुछ भी शाश्वत नहीं है।
मुनि श्री ने अपेक्षा मुक्त जीवन जीने की सलाह दी और कहा कि जितनी अपेक्षा रखोगे, टूटने पर उतना ही दुःख मिलेगा। उन्होंने कहा, उदास रहित जीवन का मूलमंत्र है,चीजों और संबंधों के साथ रहो, पर उन्हें अपना मत मानो।
कर्म सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने कर्मों को भुगतना ही पड़ेगा,हँसकर या रोकर। अभिमान करने वालों को जब चोट लगती है, तो वे या तो लड़ते हैं या डिप्रेशन में चले जाते हैं। मुनि श्री ने कहा कि प्राप्त को पर्याप्त मानो और तत्वज्ञान के साथ जियो, यही सच्ची प्रसन्नता का मार्ग है।
