ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
हेमंत खंडेलवाल का कभी ग्वालियर चंबल की भाजपा राजनीति में सीधा हस्तक्षेप और दखल नहीं रहा लेकिन ग्वालियर में कई पुराने नेता हैं जिनसे नए भाजपा अध्यक्ष के उस वक्त से पारिवारिक रिश्ते हैं, जब उनके पिताश्री सांसद होते थे। बहरहाल, प्रदेश भाजपा की कमान संभालने के बाद हेमंत खंडेलवाल पहली दफा ग्वालियर आ रहे हैं और उनके स्वागत, अभिनन्दन के लिए ग्वालियर की सड़कें और गली चौबारे सज गए हैं।
ग्वालियर चम्बल की भाजपा को नेताओं के आपसी मतभेदों से उबार कर पार्टी को एकजुट कर मिशन 2028 की चुनौती से मुक़ाबिल करने के लिए तैयार करना नए अध्यक्ष के लिए प्रथम सर्वोपरि चुनौती है। वैसे खंडेलवाल के प्रदेश अध्यक्ष पद पर चयन के वक्त उनके नाम पर जिस तरह सर्वसम्मति उभरी, वह ग्वालियर भाजपा के लिए सकारात्मक वातावरण की आस लगाए कार्यकर्ताओं के लिए शुभ संकेत है। खंडेलवाल के स्वागत की तैयारियों में भी स्थानीय भाजपा नेताओं की एकजुटता दिख रही है। यह किसी से छिपा नहीं है कि ग्वालियर चंबल में भाजपा स्पष्ट तौर पर सिंधिया और नरेंद्रसिंह के खेमों के बीच विभक्त नजर आती है। इसके अलावा ग्वालियर में ही जयभान सिंह पवैया जैसे प्रतिबद्ध नेता भी हैं जो किसी एक खेमे से न जुड़कर अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।
पार्टी के कार्यक्रमों एवं गतिविधियों में गुटबाजी साफ दिखी है। इसी का नतीजा है कि ग्वालियर के तीनों प्राधिकरण पिछले सात साल से खाली पड़े हुए हैं। एल्डरमैन से लेकर निगम मंडलों तक में नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। ग्वालियर शहर जनसंघ से लेकर भाजपा तक की स्थापना तक संस्थापक भूमि रही है। पिछले दो दशकों में ही नरेन्द्र सिंह तोमर और प्रभात झा से लेकर वीडी शर्मा तक को मप्र भाजपा का अध्यक्ष रहने का अवसर मिला। इस बार भी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद के लिए ग्वालियर चंबल अंचल से कई दावेदारी उभरी थीं लेकिन सर्वसम्मति हेमंत खंडेलवाल के नाम पर उभरी। देखना है कि प्रदेश भाजपा के नए मुखिया ग्वालियर में पार्टी को एकजुट कर भविष्य की चुनौतियों पर विजय के लिए किस तरह के कदम उठाते हैं और स्थानीय नेता अपनी निजी प्रतिद्वंदता और मान प्रतिष्ठा भुलाकर उन्हें सहयोग करते हैं।
ग्वालियर मेला में फिर झमेला!
ग्रीष्मकालीन मेले की असफलता के बाद मेला प्राधिकरण अब दिसंबर से शुरू होने वाले वार्षिक मेला की तैयारी में जुट गया है लेकिन इसी बीच मेला प्राधिकरण के एक फैसले ने पिछली कई पीढ़ियों से मेला में दुकानें लगाते आ रहे व्यापारियों को मुसीबत में डाल दिया है। मेला प्राधिकरण ने फरमान जारी कर दिया है कि ग्वालियर मेला की 75 प्रतिशत दुकानों को ईं टेंडर के माध्यम से आवंटित किया जाएगा और सिर्फ 25 प्रतिशत दुकानें ही पुराने दुकानदारों को प्राथमिकता के आधार पर मिलेंगी। मेला व्यापारी इस नई नीति से सख्त नाराज हैं। दरअसल, मेला प्राधिकरण का मानना है कि मेला में बहुतायत से शिकमी दुकानदार है और कुछ व्यापारी दुकानों का गलत तरह से हेरफेर करते हैं लेकिन मेला व्यापारी संघ का तर्क है कि कुछ मुनाफाखोर व्यापारियों के कृत्य की सजा सभी सौ प्रतिशत दुकानदारों को नहीं दी जा सकती है। मेला व्यापारियों ने अब एक सुर से मांग की है कि ग्वालियर मेला में यदि शिकमी या नकली दुकानदार है तो जांच कर उनके आवंटन निरस्त किए जाएं और मेला में दुकान आवंटन की वही प्रक्रिया अनवरत रखी जाए जो पिछले 119 साल से जारी है। प्राधिकरण के एक फैसले से मेला में झमेला पैदा तो हो ही गया है।
लापता हुए बाढ़ नियंत्रण कंट्रोलरूम
समूचे ग्वालियर चंबल अंचल में पिछले हफ्तेभर से हो रही झमाझम बारिश के चलते कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात हैं। पचासों गांवों का जिला मुख्यालयों से संपर्क टूट गया है। हालत यह है कि अंचल के सभी बांधों के गेट कई कई बार खोलना पड़े हैं। पुल रपटे पानी में डूब गए हैं। बाढ़ नियंत्रण कंट्रोलरूम नदारद हैं। अंचल के कई इलाकों में इस जल आपदा के समक्ष प्रशासन भी बेबस नजर आ रहा है।
