लापरवाही की भेंट चढ़ते निर्माण कार्य

गुजरात के नर्मदा जिले में एक पुल के गिरने की ताजा घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत अपने बुनियादी ढांचे को लेकर वास्तव में गंभीर है ? इस हादसे में कई वाहन नदी में समा गए और दर्जनों लोगों की जान चली गई. इससे पहले जून 2024 में बिहार के सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जिलों में तीन सप्ताह के भीतर चार पुल गिर चुके थे. उस समय राज्य सरकार ने इसे “प्राकृतिक आपदा” और “जल-प्रवाह की तीव्रता” से जोड़ा था, लेकिन क्या यह तर्कसंगत है?.

बिहार के कटिहार जि़ले में गंगा पर बना 263 करोड़ रुपये का पुल उद्घाटन से पहले ही ढह गया था. झारखंड के साहिबगंज में गंगा पर बन रहा पुल तीन बार गिर चुका है, और उसकी लागत अब तक 2000 करोड़ रुपये पार कर चुकी है. पश्चिम बंगाल के बहरामपुर में 2023 में पुल ढहने से सात लोगों की जान गई थी.

मध्य प्रदेश के खरगोन जि़ले में 2024 की बारिश में तीन पुलों पर आवाजाही रोकनी पड़ी क्योंकि निर्माण के एक साल के भीतर ही दरारें आने लगी थीं. उत्तराखंड में 2023 में चारधाम यात्रा के दौरान 9 जगह सडक़ें धंस गईं, जबकि उन पर हाल ही में करोड़ों का निर्माण हुआ था.यह समस्या सिर्फ तकनीकी नहीं है. यह शासन व्यवस्था, संस्थागत जवाबदेही और राजनैतिक इच्छाशक्ति की असफलता है. सडक़ों, पुलों और भवनों के निर्माण में भ्रष्टाचार एक स्वीकृत परंपरा बन चुका है. ठेकेदारों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है. अधिकारियों की लापरवाही पर आंखें मूंद ली जाती हैं, और जांचें केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं.

आजादी के पहले बने ब्रिज आज भी सक्रिय हैं—जैसे मुंबई का ‘कैनेडी ब्रिज’ या कोलकाता का ‘हावड़ा ब्रिज’—जबकि हाल में बने कई पुल उद्घाटन से पहले ही गिर रहे हैं .

भारत सरकार ने 2023 में “नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन” और “गति शक्ति योजना” जैसी योजनाएं घोषित की थीं, जिनका उद्देश्य देशभर में कनेक्टिविटी सुधारना था. लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी और क्रियान्वयन की स्थिति यह है कि करोड़ों के बजट के बाद भी बुनियादी ढांचा “अस्थायी” बना हुआ है.

नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ मंत्री खुद स्वीकार कर चुके हैं कि कई परियोजनाओं में गुणवत्ता से समझौता हुआ है. लेकिन जब तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह स्वीकारोक्ति भी जनता की पीड़ा पर मरहम नहीं बन सकती. दरअसल इसे रोकने के लिए जरूरी है कि राष्ट्रीय निर्माण गुणवत्ता आयोग जैसा स्वतंत्र निगरानी निकाय गठित किया जाए.प्रत्येक निर्माण परियोजना की ‘डिजिटल ट्रैकिंग’ और ‘पब्लिक ऑडिट रिपोर्ट’ उपलब्ध कराई जाए.दोषी पाए गए ठेकेदारों और इंजीनियरों को ब्लैकलिस्ट और दंडित किया जाए.

निर्माण कंपनियों को पांच साल की गारंटी और वार्षिक निरीक्षण दायित्व सौंपा जाए.कुल मिलाकर हमारे नेताओं की घोषणाओं में “इन्फ्रास्ट्रक्चर क्रांति” की बातें हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी एक पुल बनना जितना कठिन नहीं, उतना उसे टिकाए रखना हो गया है. अगर हर पुल गिरने के बाद मुआवजे और जांच से आगे कुछ नहीं होता, तो फिर हम किस ‘विकसित भारत’ की नींव रख रहे हैं ? क्योंकि जब बुनियाद ही भरोसेमंद नहीं, तो इमारत चाहे जितनी ऊंची हो—वह ढह ही जाएगी. जाहिर है सरकारी पैसों से बनाए जा रहे निर्माण लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते जा रहे हैं.

 

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