पुस्तकों पर आयात शुल्क समाप्त करने की मांग

नयी दिल्ली, 10 जुलाई (वार्ता) दिल्ली स्टेट बुक सेलर्स एंड पब्लिशर्स एसोसिएशन ने केन्द्र सरकार द्वारा पुस्तकों के आयात पर लगायी गयी पांच प्रतिशत आयात शुल्क को समाप्त करने की मांग की है।

एसोसिएशन के अध्यक्ष हिमांशु चावला ने कहा कि इस आयात शुल्क से सरकारी राजस्व में कोई सार्थक बढ़ोतरी नहीं हुई है और न ही इस शुल्क के लागू होने के बाद विदेशी प्रकाशकों ने वैज्ञानिक और तकनीकी किताबों की प्रिंटिंग भारत से शुरू की है तथा इससे आयात शुल्क लगाने के दोनों उद्देश्य पूरे नहीं हुए हैं।

उन्होंने बताया कि इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि विकसित देशों में किताबों के आयात पर कोई आयात शुल्क नहीं लगाया जाता और भारत द्वारा लगाये गये आयात शुल्क के जबाब में यह देश भी किताबों पर यह शुल्क लगा सकते हैं जिससे देश की प्रिंटिंग इंडस्ट्री को आर्थिक नुकसान पहुंचेगा और विदेशी राजस्व संग्रह पर प्रभाव पड़ेगा तथा रोजगार के साधन सीमित हो जायेंगे।

श्री चावला ने कहा कि इस समय देश में इंग्लैंड, अमेरिका तथा यूरोपीय देशों से विज्ञान, टेक्नोलॉजी और मेडिकल शिक्षा की किताबें आयात की जाती हैं जोकि ऑक्सफोर्ड , हारवर्ड, एमआईटी जैसे विश्व प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा वर्षों के शोध के निष्कर्ष के आधार पर प्रकाशित की जाती हैं तथा यह किताबें भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसंधान एवं विकास के लिए प्रयोग की जाती हैं। उन्होंने बताया कि इन किताबों पर आयात शुल्क लगाने से यह महंगी हो रही हैं जिससे युवा वैज्ञानिक, छात्रों की शिक्षा प्रभावित हो रही है और मध्यम वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले परिवारों के छात्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इस आयात शुल्क को भारतीय प्रिंटिंग उद्योग को बढ़ाने तथा विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपनी किताबें भारत में प्रिंटिंग करने के उद्देश्य से लागू किया गया था, लेकिन यह दोनों उद्देश्यों में असफल रहा है क्योंकि आयात शुल्क लागू होने के बाद न तो किसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने भारत से पुस्तकों का प्रकाशन शुरू किया है और न ही सरकार को कोई बड़ा राजस्व हासिल हुआ है बल्कि उलटे शैक्षणिक किताबों की कीमतों में बढ़ोतरी से छात्र वर्ग विशेषकर गरीब और पिछड़े तबके के छात्रों पर बोझ बढ़ा है जिससे उनको उच्च शिक्षा ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न हो रही है ।

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक किताबों पर इम्पोर्ट ड्यूटी से इनकी कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से अनुसंधान संस्थानों और पब्लिक पुस्तकालयों पर विपरीत असर पड़ा है क्योंकि यह संस्थान कोविड महामारी के बाद बजट की तंगी से जूझ रहे हैं तथा महंगी किताबें लेने से परहेज कर रहे हैं जिसकी वजह से छात्र मुश्किल का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि आयात शुल्क लागू होने से प्रिंटिंग उद्योग को धरातल पर कोई फायदा नहीं हुआ है और इस कर के लागू होने के बाद किसी बड़ी विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने भारत में प्रकाशन शुरू नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि प्रिंटिंग उद्योग कठिन दौर से गुजर रहा है और सरकार से प्रिंटिंग उद्योग में सुधार लाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि हालांकि किताबों को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से मुक्त रखा गया है, लेकिन पुस्तकों के प्रकाशन से जुड़े फ्रीलांस उद्योगों, कॉपी एडिटर, प्रूफ रीडर्स, इलस्ट्रेटर आदि पर 18 प्रतिशत जीएसटी लागू है जबकि लेखकों की रॉयल्टी पर 12 प्रतिशत जीएसटी लागू है।

 

 

 

 

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