आधुनिक भारत के माथे पर एक धब्बा

पूर्णिया जिले के टेटमा गांव में एक ही परिवार के पांच लोगों को ‘डायन’ बताकर जिंदा जलाया जाना आधुनिक भारत के माथे पर एक शर्मनाक धब्बा है. यह घटना किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस सामूहिक असफलता की गवाही है, जिसमें विज्ञान की उपलब्धियों की चमक के बीच अंधविश्वास का अंधेरा आज भी कई जीवन निगल रहा है.

आज भारत विश्वगुरु बनने की बात कर रहा है, चंद्रयान और गगनयान जैसे अभियानों पर करोड़ों का निवेश कर रहा है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग की दिशा में अग्रसर है. लेकिन क्या इन वैज्ञानिक उपलब्धियों का कोई मतलब रह जाता है, जब हमारे गांवों में दो सौ से अधिक लोगों की भीड़, एक बीमार बच्चे के ठीक न होने की वजह से, एक पूरे परिवार को ‘डायन’ बताकर जिंदा जला देती है ? यह घटना सा$फ दर्शाती है कि भारत में विज्ञान के विस्तार और वैज्ञानिक चेतना के विस्तार के बीच एक गहरी खाई है. हम रॉकेट तो बना रहे हैं, लेकिन समाज के भीतर वैज्ञानिक सोच नहीं बना पा रहे. ‘डायन प्रथा’ जैसी बर्बर कुप्रथा आज भी जीवित है, क्योंकि हमने शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने का माध्यम बना दिया है, सोचने, तर्क करने और जिज्ञासा से सच्चाई तलाशने का अभ्यास नहीं सिखाया.यह घटना सवाल उठाती है कि आखिर हमारी स्कूल व्यवस्था, हमारे सामाजिक जागरूकता अभियान, और हमारे जनप्रतिनिधि इस अंधविश्वास से लडऩे में क्यों विफल हो रहे हैं ? आज भी बिहार के हजारों गांवों में विज्ञान सिर्फ किताबों तक सीमित है. ग्रामीण स्कूलों में विज्ञान पढ़ाया तो जाता है, लेकिन विज्ञान की दृष्टि यानी आलोचनात्मक और तर्कपूर्ण सोच का विकास नहीं हो पाता.

क्या बच्चों को यह समझाया जा रहा है कि बीमारी किसी डायन के कारण नहीं, बल्कि बैक्टीरिया, वायरस, कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण होती है ? क्या हम गांवों में यह बात पहुँचा पा रहे हैं कि हर प्राकृतिक घटना का वैज्ञानिक कारण होता है और इसका हल किसी ओझा या तांत्रिक के पास नहीं, डॉक्टर और वैज्ञानिकों के पास होता है .

इस हत्याकांड की भयावहता और खुली बर्बरता इस बात की गवाही देती है कि लोगों के मन से पुलिस और कानून का भय खत्म हो चुका है.दो सौ से अधिक लोग एक परिवार को जला रहे हैं, और कहीं कोई प्रशासन, कोई हस्तक्षेप, कोई सुरक्षा नहीं है,यह ‘राज्य विहीनता’ की स्थिति है. सरकार की भूमिका केवल एफआईआर और मुआवज़े तक सीमित रह गई है.हमें स्वीकार करना होगा कि यह लड़ाई केवल अपराध से नहीं, बल्कि अज्ञान, भय, और पीढिय़ों से चली आ रही कुचेतना से है. इसका जवाब केवल कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती, इसके लिए ज़मीनी स्तर पर एक सघन वैज्ञानिक चेतना अभियान चलाने की जरूरत है.

हर पंचायत में ‘विज्ञान क्लब’ बनाए जाएं, जिसमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भाग लें और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपने जीवन से जोड़ सकें.स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में अंधविश्वास विरोधी अध्ययन शामिल किया जाए और डायन प्रथा जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध खुलकर चर्चा हो.

जन-स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा का गहरा आपस में समन्वय हो, ताकि बीमारी की दशा में लोग ओझा-तांत्रिक के पास नहीं, डॉक्टर के पास जाएं.

पूर्णिया की यह घटना केवल दुखद नहीं, एक सामूहिक आत्मग्लानि का क्षण है.यह हमें याद दिलाती है कि अगर हम आधुनिकता और परंपरा के बीच सामंजस्य नहीं बना पाए, तो विज्ञान के मंदिरों से निकलकर भी हम अंधविश्वास के दलदल में फंसे रहेंगे.

अब समय आ गया है कि बिहार ही नहीं, पूरे देश में वैज्ञानिक चेतना को संविधान के मूल मूल्य की तरह देखा जाए, न कि एक वैकल्पिक विचारधारा के रूप में.जब तक विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं में रहेगा और समाज में उसका प्रभाव नहीं दिखेगा, तब तक ऐसी घटनाएं हमारी आत्मा को जलाती रहेंगी.

 

 

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