नई दिल्ली, 7 जुलाई (वार्ता) केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश में मक्का उत्पादन को 2047 तक दो गुना से अधिक करने की सरकार की योजना का एक खाका प्रस्तुत करते हुए सोमवार को कहा कि यह लक्ष्य अनुसंधान, कृषक शिक्षा और उन्नत कृषि पद्धतियों के जरिए प्राप्त किया जा सकता है।
श्री चौहान यहां भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) द्वारा भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (आईआईएमआर) के सहयोग से आयोजित भारत मक्का शिखर सम्मेलन के 11वें संस्करण का उद्घाटन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि भारत में मक्का उत्पादन 1990 के दशक में एक करोड़ टन वार्षिक था जो अब 4.23 करोड टन तक पहुंच गया है। इसे 2047 तक अनुमानित 8.6 करोड़ टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
उन्होंने कहा कि भारत में मक्का की उपज 3.7 टन प्रति हेक्टेयर पर बनी हुई है जो वैश्विक मानकों से कम है। उत्पादकता में बिहार और पश्चिम बंगाल अग्रणी राज्यों में हैं। कृषि मंत्री ने मक्का क्षेत्र में बदलाव के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप प्रस्तुत करते हुए कहा कि बेहतर शोध, किसान शिक्षा और उन्नत कृषि पद्धतियों के माध्यम से मक्का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
श्री चौहान ने इस बात पर जोर दिया कि “किसानों की सेवा हमारा मूल मंत्र है,” उन्होंने किसान-केंद्रित नीतियों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि मक्का उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की रूपरेखा तैयार की गयी है। इसके साथ ही पर्यावरणीय स्थिरता पर भी ध्यान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ (प्रयोगशाला से भूमि तक अभियान) के तहत, सरकार ने प्रयोगशाला अनुसंधान और क्षेत्र अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटने के लिए 7000-8000 गांवों में लगभग 11,000 कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों को तैनात किया गया। उन्होंने कहा ‘हमने तय किया है कि वैज्ञानिक किसानों के खेतों में जाएंगे।”
सम्मेलन के एक सत्र में उत्तर प्रदेश के कृषि, कृषि शिक्षा और अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि उत्तर प्रदेश त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम में इस बार 24 जिलों में 5,40,000 हेक्टेयर में मक्के की खेती का विस्तार हुआ है।उन्होंने कहा कि विशेष बजट के साथ फसल विविधीकरण योजना में मक्का की खेती को प्रोत्साहित किया गया है।
उत्तर प्रदेश में मक्के की औसत उपज बढ़ कर औसतन 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गयी है और इस मौसम में 40 क्विंटल से अधिक होने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि 15 कंपनियां अब पूरे उत्तर प्रदेश में मक्का प्रसंस्करण में लगी हुई हैं, जबकि सरकार फाइबर के उत्पादन और प्लास्टिक के लिए बायोडिग्रेडेबल विकल्पों सहित मूल्यवर्धित अवसरों की खोज कर रही है।
फिक्की की कृषि समिति के सह-अध्यक्ष और कॉर्टेवा एग्रीसाइंस के दक्षिण एशिया अध्यक्ष सुब्रतो गीद ने कहा कि मक्का अब केवल एक फसल नहीं रह गया है – यह एक राष्ट्रीय अनिवार्यता है। खाद्य सुरक्षा, पशुधन चारा और जैव ईंधन में इसकी पूरी क्षमता को उजागर करने के लिए, हमें प्रति हेक्टेयर उत्पादकता को बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीकों, लचीली बीज प्रणालियों और डिजिटल कृषि की ओर रणनीतिक कदम उठाने की आवश्यकता है।
भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान -आईसीएआर-के निदेशक डॉ. एचएस जाट ने महत्वाकांक्षी उत्पादकता लक्ष्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि 2030 तक 6.5-7.0 करोड़ टन हासिल करने के लिए मक्का उत्पादन में सालाना 8-9 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए। इससे इथेनॉल मिश्रण के ई30 के लक्ष्य को हासिल करने में मदद होगी।
उन्होंने मक्के से इथेनॉल रिकवरी को वर्तमान 38 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने के लिए बेहतर स्टार्चवाली संकर किस्मों की उपज की आवश्यकता बतायी ।
उन्होंने बताया कि संस्थान रबी-वसंत मौसम में 10-11 टन प्रति हेक्टेयर और खरीफ में 7-8 टन क्षमता वाली उच्च उपज देने वाली किस्में विकसित कर रहा है।
यस बैंक में खाद्य और कृषि व्यवसाय रणनीतिक सलाह और अनुसंधान के राष्ट्रीय प्रमुख संजय वुप्पुलुरी ने एक प्रस्तुति में दिखाया कि भारत में अनाज बजार में मक्का सबसे तेजी से आगे बढ़ रही फसल है। पिछले दशक में, क्षेत्रफल 31 प्रतिशत बढ़कर 1.2 करोड़ हेक्टेयर हो गया, जबकि उत्पादन 75 प्रतिशत बढ़कर 4 करोड़ टन से अधिक हो गया। उन्होंने कहा कि देश में मक्के का उत्पादन 5.8 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ा है पर खपत 6.7 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। पोल्ट्री फ़ीड 51 प्रतिशत मांग के साथ मक्के का सबसे महत्वपूर्ण उपभोक्ता बना हुआ है।
