आष्टा. नगर के श्री चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर अरिहंत पुरम अलीपुर में वाककेशरी श्रमणाचार्य विनिश्चय सागर मुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री प्रवर सागर मुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित किया.
उन्होंने कहा कि कर्म किसी को नहीं छोड़ता है. आज लोगों के पास धन बढ़ रहा है, लेकिन आयु घट रही है. बच्चों को साधु बनाना है कि कलेक्टर बनाना है. पुत्र को मोक्ष मार्ग दिखाना चाहिए, नौकरी को श्रेष्ठ समझ रहे हो, नौकरी करने से नौकर कहलाते हैं और व्यापार करने से सेठ कहलाते हैं. कोल्हू का बैल नहीं धर्मात्मा बनों. धर्म और भक्ति करके भूतनाथ बनने का पुरुषार्थ चल रहा है. जितने भी भूतनाथ हुए हैं वो जिनवाणी के बल से और आत्मविशुद्धि से हुए हैं. अभी जो अष्टांहिका महापर्व चल रहे हैं वो शाश्वत पर्व हैं. लेकिन इन पर्वों को कैसे अपने जीवन में उतारना है ये कोई नहीं समझ पा रहा है. पर्वों को कोई नहीं समझता, वहीं पकवान सभी को समझ में आते हैं. पर्व के दिनों में सिद्धों की आराधना करने से सिद्धत्व की प्राप्ति होती है. पर्वों में जो भगवान के पावन श्री चरणों में आत्म विशुद्धि की भावना से अष्ट द्रव्य समर्पित करता है तभी सिद्धों की आराधना करना सार्थक है.
मुनिश्री ने कहा कि मंदिर में पुण्य का संचय और मंदिर से बाहर निकलते ही पाप कर्म शुरू हो जाता है. अहिंसा धर्म अभी समझ में नहीं आ रहा है. स्नान में भी छने पानी का उपयोग करें, जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक के लिए स्नान करने से पुण्य अर्जित होगा. निरंतर पुण्य का बंध करें.
