केंद्र सरकार और LIC की संयुक्त 60.72% हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में निर्णायक मोड़; वित्तीय बोलियां आमंत्रित करने की तैयारी तेज, बैंकिंग सेक्टर में दक्षता बढ़ाने पर जोर।
नई दिल्ली, 28 जून (नवभारत): देश के बैंकिंग सेक्टर में एक बड़े बदलाव की तैयारी है। सरकारी क्षेत्र के महत्वपूर्ण बैंक, आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) के निजीकरण की प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, बैंक के रणनीतिक विनिवेश से संबंधित शेयर खरीद समझौते (Share Purchase Agreement – SPA) को अंतर-मंत्रालयी समूह (Inter-Ministerial Group – IMG) से मंजूरी मिल गई है। यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आईडीबीआई बैंक जल्द ही एक निजी बैंक में तब्दील हो सकता है, जो भारत सरकार की विनिवेश रणनीति का एक अहम हिस्सा है।
वर्तमान में, केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास संयुक्त रूप से आईडीबीआई बैंक की लगभग 95% हिस्सेदारी है। इस प्रक्रिया के तहत, सरकार और LIC मिलकर अपनी संयुक्त हिस्सेदारी का 60.72% बेचने की योजना बना रहे हैं, जिसमें बैंक का प्रबंधन नियंत्रण भी शामिल होगा। पिछले तीन वर्षों में कई बार देरी का सामना करने के बावजूद, सरकार इस महत्वपूर्ण हिस्सेदारी बिक्री को मौजूदा वित्तीय वर्ष के भीतर पूरा करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। एसपीए को मंजूरी मिलने के बाद, अब यह मामला विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप के समक्ष रखा जाएगा, जिसके बाद संभावित खरीदारों से वित्तीय बोलियां आमंत्रित करने का रास्ता साफ हो जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य बैंकिंग सेक्टर को अधिक सक्षम और कुशल बनाना है, और निजी पूंजी को आकर्षित करके आईडीबीआई बैंक के कामकाज में पेशेवर दक्षता लाने की उम्मीद है।
लंबे समय से घाटे में रहे बैंक को मिलेगा नया जीवन, बोलीदाताओं में कई दिग्गज शामिल
आईडीबीआई बैंक लंबे समय से चुनौतियों का सामना कर रहा था, और इसे मजबूत करने के लिए निजी पूंजी की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इस निजीकरण से बैंक के कामकाज में अधिक प्रतिस्पर्धात्मकता आने और नई बैंकिंग समाधानों को अपनाने की उम्मीद है।
आईडीबीआई बैंक को खरीदने की दौड़ में कई दिग्गज कंपनियां और वित्तीय संस्थान शामिल हैं, जिनमें फेयरफैक्स, अमीरात एनबीडी, ओकट्री कैपिटल और कोटक महिंद्रा बैंक जैसे नाम सामने आए हैं। इन शॉर्टलिस्ट किए गए बोलीदाताओं को पहले ही बैंक के गोपनीय डेटा तक पहुंच प्रदान की जा चुकी है, जिससे वे अपनी अंतिम बोलियां प्रस्तुत करने से पहले वित्तीय विवरणों की समीक्षा कर सकें। सरकार को उम्मीद है कि इस सौदे से ₹40,000 करोड़ से ₹50,000 करोड़ जुटाए जा सकेंगे, जो सरकार के व्यापक विनिवेश लक्ष्यों में महत्वपूर्ण योगदान देगा। यह लेन-देन भारत के बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के भविष्य के निजीकरण के लिए एक नजीर स्थापित करेगा।

