सैन्य शौर्य पर तिरंगा यात्रा के सहारे जनता की नब्ज टटोलने में जुटी भाजपा
प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली
आपरेशन सिंदूर के तहत हुई सैन्य कार्रवाई और उसी दौरान युद्धविराम की घोषणा के बीच जहां भारत की सैन्य शक्ति की चौतरफा सराहना हो रही है वहीं दूसरी ओर युद्धविराम के निर्णय में कथित तौर पर विदेशी हस्तक्षेप के कारण सत्तारूढ़ दल संपूर्ण विपक्ष के निशाने पर है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्यों सेना के आक्रामक प्रहार के ताप को युद्धविराम के पानी से ठंडा कर दिया गया? क्यों सर्व समर्थन संपन्न सरकार अचानक अपने रूख में बदलाव को मजबूर हो गई? उक्त सवालों की श्रृंखला में बहुत सारे संवेदनशील सवाल मुंह खोले खड़े हैं.
राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राष्ट्र के नाम संदेश में बहुत सवालों का जवाब सांकेतिक शब्दावली में दे दिया है. इसके बावजूद कई प्रश्न आपरेशन सिंदूर के पहले से ही मीडिया के लिए जारी दिशा निर्देश के अनुपालन में अनुत्तरित रह गए. हालांकि तथ्यात्मक जानकारी को सार्वजनिक किए बगैर जो कुछ दिल्ली की उच्चस्तरीय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है उसके मुताबिक सरकार ने जो निर्णय किया वह राष्ट्रहित व जनहित में है. कम समय में युद्ध के दौरान जिस तरह से टारगेटेड हमला किया गया वह दूरगामी परिणाम के रूप में पड़ोसी मुल्क पर दिखेगा.
ऐसा कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के परमाणु संयंत्र भी भारतीय मिसाइलों के निशाने बने हैं. हालांकि इसकी औपचारिक पुष्टि अभी किसी पक्ष की ओर से नहीं हुई है. इसके बावजूद यदि ऐसा हुआ है तो निश्चित रूप से विश्व में भारतीय सेना की धमक और शौर्य को उच्च स्थान प्राप्त हुआ है .बावजूद इसके राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि आम जनमानस के बीच जो संदेश गया है वह भाजपा के लिए बेहतर नहीं रहा है. संभवतः इसी वजह से पार्टी रणनीतिकारों ने डैमेज कंट्रोल के तहत हरेक शहर में तिरंगा यात्रा निकालकर आमलोगों के मन में सैन्य शौर्य व भावनात्मक लगाव को स्थापित करने का प्रयास आरंभ किया गया है.
जबकि कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों की ओर से कथित तौर पर अमेरिका के दबाव में सरकार द्वारा उठाए गए कदम पर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद में चर्चा की मांग की जा रही है. हालांकि कुछ सैन्य जानकार प्रधानमंत्री व रक्षा मंत्री के बयानों को आधार बनाकर कह रहे हैं कि भारतीय सैनिकों ने आपरेशन सिंदूर के उद्देश्य को पूरा करने में सफलता हासिल कर ली है ऐसे में इस विषय पर चर्चा सही नहीं है. जानकार यह मान रहे हैं कि जो तथ्य सामने आए हैं उसके मुताबिक इस युद्ध में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिसके संदर्भ में वर्षों तक रहस्य बरकरार रहेगा.
पाकिस्तान भी भारतीय सेना द्वारा सार्वजनिक किए गए साक्ष्यों व तथ्यों को झूठलाने का साहस नहीं दिखा रहा है. संभवतः इसी वजह से विपक्षी मांग के बावजूद सरकार संसद का विशेष सत्र नहीं बुला रही है. इस बीच मध्यस्थता के संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बदला हुआ बयान भी भारतीय कुटनीतिक उपलब्धि का नया आयाम है. कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा है कि युद्ध नीति सार्वजनिक नहीं की जा सकती है लेकिन युद्ध की उपलब्धि और उसके बीच अचानक युद्धविराम की घोषणा स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय है. इसलिए विपक्षी दल भारत की युद्ध नीति के बजाय विदेशनीति पर केंद्रित बहस चाह रहे हैं .
