
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत, जस्टिस एसए धर्माधिकारी व जस्टिस विवेक जैन की फुल कोर्ट बेंच ने आबकारी अधिनियम की उस धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया है, जिसके अंतर्गत अवैध शराब आदि अपराधों में शामिल वाहन को राजसात करने का अधिकार कलेक्टर के पास था। हाईकोर्ट द्वारा यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किए जाने के साथ ही राजसात करने का अधिकार अब ट्रायल कोर्ट को मिल गया है।
हाईकोर्ट ने इस आदेश के साथ ही उस समस्या को निर्मूल कर दिया गया है, जो ट्रायल पूरी होने के बाद वाहन मालिक के दोषमुक्त होने की दशा में समुपस्थित होती थी। नवीन व्यवस्था के अंतर्गत अब वाहन वापस हासिल करने के लिए अपेक्षाकृत विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाई जा सकेगी। ट्रायल कोर्ट इस सिलसिले में सुनवाई का अवसर मुहैया कराएगी। हाईकोर्ट की फुल कोर्ट बेंच ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। इसके अंतर्गत गौवंश अधिनियम के अंतर्गत होने वाले अपराध में कलेक्टर वाहन को तब राजसात कर सकेंगे, जब ट्रायल कोर्ट आरोपित को सजा सुना देगी और वाहन का उपयोग होना साबित हो जाएगा। हाईकोर्ट का यह आदेश उन सभी विचाराधीन प्रकरणों पर प्रभावी होगा, जिसमें आज की तिथि तक जिला दंडाधिकारी ने राजसात या जब्ती का आदेश नहीं दिया है।
दरअसल, सागर निवासी राजेश विश्वकर्मा, तेंदूखेड़ा नरसिंहपुर निवासी रामलाल झारिया व अन्य की ओर से अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे, जयंत नीखरा, संजीव नीखरा सहित अन्य ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि आबकारी अधिनियम-1915 की धारा 47-ए की संवैधानिकता वैधता चुनौती के योग्य है। वर्तमान में इस धारा के अंतर्गत वाहन को राजसात करने का अधिकार कलेक्टर के पास है। इसी भांति गोवंश अधिनियम-2004 का वह प्रविधान भी चुनौती के योग्य है, जिसके अंतर्गत अपराध में शामिल वाहन को राजसात करने का अधिकार कलेक्टर को है। अलग-अलग बेंच में लगे इन मामलों में उठाए गए वैधानिक प्रश्न के निराकरण के लिए फुल बेंच को रेफर किया गया था। मैराथन सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विवेक रंजन ने दलील दी कि कई बार मालिक की मर्जी बिना भी वाहन का उपयोग होता है। लंबी ट्रायल के चलते राजसात वाहन कंडम हो जाते हैं और उनकी नीलामी हो जाती है। कई लोग ऋण लेकर वाहन खरीदते हैं। वाहन जब्त होने से मालिक को अपूर्णीय क्षति होती है। हाईकोर्ट ने तर्कों से सहमत होकर महत्वपूर्ण आदेश पारित कर दिया।
