नैतिक पुलिसिंग अदालतों का काम नहीं :उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, 08 अप्रैल (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि अदालतों को नैतिक पुलिसिंग नहीं करनी चाहिए।
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं, जिसमें राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला और संगीतकार विशाल ददलानी पर 2016 में ट्विटर पर जैन संत तरुण सागर का कथित तौर पर अपमान करने और उनका मजाक उड़ाने के लिए 10-10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
पीठ ने पूछा, “अदालत (पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय) ने किस तरह का आदेश पारित किया है?
अदालत को नैतिक पुलिसिंग नहीं करनी चाहिए। यह अदालत का काम नहीं है।”
शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं (तहसीन पूनावाला और विशाल ददलानी) को राहत देते हुए कहा कि उच्च न्यायालय इस तथ्य से प्रभावित था कि अपीलकर्ताओं ने एक खास धर्म के पुरोहित की आलोचना की थी। याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा, “हमारा मानना ​​है कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते समय यह पाया गया कि कोई भी अपराध नहीं बनता है, इसलिए उच्च न्यायालय को अपीलकर्ता (पूनावाला और ददलानी) को यह बताकर सलाहकार अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए था कि पुजारी द्वारा किया गया योगदान अपीलकर्ता और अन्य आरोपियों द्वारा किए गए योगदान से कहीं अधिक है। न्यायालय का कार्य नैतिक पुलिसिंग करना नहीं है।”
उच्च न्यायालय ने (इस मामले में) अपने 2019 के आदेश में आपराधिक मामले को रद्द कर दिया था, लेकिन 2016 में ट्विटर पर जैन संत तरुण सागर का कथित रूप से अपमान करने और उनका मजाक उड़ाने के लिए ददलानी और पूनावाला पर जुर्माना लगाया था।
उच्च न्यायालय ने दोनों पर जुर्माना लगाते हुए कहा था कि उन्होंने पुजारी का अपमान किया है और जैन धर्म के अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि जुर्माना इसलिए जरूरी था ताकि भविष्य में वे सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए किसी धार्मिक संप्रदाय के प्रमुख का मजाक न उड़ाएं।
यह आरोप लगाया गया कि पूनावाला ने जैन संत के साथ एक अर्धनग्न महिला की फोटोशॉप की हुई तस्वीर पोस्ट की और सामाजिक मानदंडों पर सवाल उठाया।

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