पुरुषों के चित्रण में बदलाव की जरूरत पर जोर

नयी दिल्ली 01 अप्रैल (वार्ता) विज्ञापनों में पुरुषों को दिखाने के तरीके में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा गया है कि पुरुषों का चित्रण एक ही ढांचे में सीमित नहीं होकर अलग-अलग स्वरूपों में किया जाना चाहिए।

भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) ने यूएन वूमेन के अनस्टीरियोटाइप एलायंस और नॉलेज पार्टनर रिलीजियस के सहयोग से मंगलवार को यहां जारी “ मैनिफेस्ट: मस्कुलिनिटीज़ बियॉन्ड द मास्क” रिपोर्ट में कहा गया कि पुरुषों को लेकर समाज की पारंपरिक सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है, जिससे कई पुरुष खुद को अलग-थलग और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बदलते सामाजिक परिदृश्य और लैंगिक समानता के बढ़ते प्रभाव के कारण वे इस उलझन में हैं कि उन्हें खुद को किस तरह व्यक्त करना चाहिए।

अध्ययन के अनुसार पुरुषों को उनके विविध अनुभवों के आधार पर अधिक समावेशी और वास्तविक तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे वे खुद को बेहतर ढंग से समझ सकें और समाज में अपनी पहचान को स्पष्ट कर सकें।

यह रिपोर्ट समाज और मीडिया में पुरुषत्व के बदलते स्वरूप को समझने का प्रयास करती है और विज्ञापनों में पुरुषों को दिखाने के तरीके में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट में इसपर भी बल दिया गया है कि पुरुषों का चित्रण एक ही ढांचे में सीमित न रहकर अलग-अलग रूपों में किया जाना चाहिए।

“ मैनिफेस्ट: मस्कुलिनिटीज़ बियॉन्ड द मास्क” रिपोर्ट 29 से अधिक साहित्यिक और शोध-पत्रों, 170 मीडिया सामग्रियों, 70 से अधिक लेखों, सामाजिक आंकड़ों और विशेषज्ञों के साक्षात्कारों के गहन विश्लेषण पर आधारित है। यह रिपोर्ट भारत में पुरुषत्व के जटिल और विकसित होते स्वरूप को समझने का प्रयास करती है और पुरुषों के अनुभवों को अधिक व्यापक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है।

रिपोर्ट दर्शाती है कि पारंपरिक ‘मर्दानगी’ की संकीर्ण परिभाषा धीरे-धीरे टूट रही है, जिससे कई पुरुष तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में खुद को असहज और भ्रमित महसूस कर रहे हैं। मूल रुप से पुरुषों की सफलता की पारंपरिक धारणाएं, रोज़गार और परिवार की ज़िम्मेदारी उठाने के मानदंड आज भी भारतीय पुरुषत्व की मूल अवधारणाओं में शामिल हैं। इसलिए यह जरूरी है कि केवल सफलता की दौड़ को बढ़ावा देने के बजाय पुरुषों की विफलताओं को भी सामान्य रूप से स्वीकार किया जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि मीडिया को ‘मर्द’ के संकीर्ण विचार से आगे बढ़कर ‘आदमी’ की संपूर्णता तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे पुरुषत्व के विविध स्वरूपों को उचित स्थान मिल सके।

विज्ञापन परिषद की महासचिव मनीषा कपूर ने कहना है कि रिपोर्ट पुरुषत्व की जटिल और रोचक दुनिया को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यूएन वुमन इंडिया की क्षेत्र प्रतिनिधि सुसान फर्ग्यूसन ने कहा कि मीडिया और विज्ञापन में विषाक्त (टॉक्सिक) ‘मर्दानगी’ को तोड़ना न केवल समाज के लिए अच्छा है, बल्कि यह व्यावसायिक दृष्टि से भी फायदेमंद है। यह रिपोर्ट विज्ञापनदाताओं और विपणन विशेषज्ञों को महिलाओं और पुरुषों का अधिक यथार्थवादी और व्यापक चित्रण करने में मदद कर सकती है, जिससे वे नए बाजारों तक पहुंच सकें और जीवन की वास्तविकताओं को सही ढंग से प्रस्तुत कर सकें।

रिपोर्ट में बल दिया गया है कि पुरुषों को जिन सामाजिक दबावों और स्थितियों का सामना करना पड़ता है, उन्हें ध्यान में रखा जाए और उनके लिए सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत किए जाएं।

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