रीवा का नाम ‘समदडिय़ा’ रखने की मांग क्यो कर रहे कांग्रेस नेता?

विंध्य की डायरी
डा0 रवि तिवारी

रीवा का नाम ‘समदडिय़ा’ रखने की मांग विधानसभा में आखिर कांग्रेस नेताओ ने ऐसी मांग क्यो की. बजट सत्र के पांचवे दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष, विधायक अजय सिंह राहुल ने रीवा शहर का नाम बदलने की मांग रख दी. उनकी इस मांग के कई मायने निकाले जा रहे है. नाम बदलने की खबर राजनीतिक गलियारो में इस समय चर्चा का विषय बन गई है. विधायक अजय सिंह ने रीवा का नाम समदडिय़ा करने की मांग की. उन्होने यह भी कहा कि सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिये. दरअसल वे सतना पालिटेक्निक की जमीन समदडिय़ा बिल्डर्स को देने पर सरकार पर तंज कसते हुए यह मांग कर रहे थे.

हुआ यह कि सदन में प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा ने सतना पालिटेक्निक की जमीन समदडिय़ा बिल्डर्स को देना का मुद्दा उठाया था. इस पर अजय सिंह ने कहा कि रीवा का एक-एक व्यक्ति कह रहा है कि रीवा का नाम बदल कर समदडिय़ा कर दिया जाय. रीवा के। री-डायवर्सिफिकेशन से कोई परेशानी नही है, लेकिन जिस तरह से समदडिय़ा समूह को रीवा में सुविधाएं और फेवर दिया जा रहा है यह गलत है और सभी को इससे दिक्कत है. सदन में उठाई गई मांग के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे है. पिछले एक दशक से समदडिय़ा समूह रीवा में काम कर रहा है. लेकिन अचानक कांग्रेस नेता हमलावर हुए है और मामला सदन तक गूंजा है इसके पीछे क्या हो सकता है तमाम तरह की अटकले राजनीतिक गलियारे में लग रही है.

कलेक्टर-एसपी पर गिरी गाज

जिले की कानून व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है. पुलिस का कोई खौफ अपराधियो में नहीं रह गया है. राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते पुलिस भी हाथ खोल कर कोई काम नही कर पा रही है. मऊगंज जिले के गडऱा गांव में हुई हिंसक घटना ने पूरे प्रदेश को हिला कर रख दिया. जिस तरह से युवक की हत्या के बाद योजनाबद्ध तरीके से पुलिस टीम पर हमला कर एक एएसआई को मौत के घाट उतारा गया.

उससे यह साबित होता है कि मऊगंज में कानून नाम की कोई चीज नही है. यहां राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है. दिल को दहला देने वाली घटना के बाद ब्राम्हण एवं सर्व समाज द्वारा रीवा बंद किया गया. परिणाम स्वरूप जनआक्रोश को कम करने के लिये सरकार ने आनन-फानन कलेक्टर और एसपी को हटा दिया और नए अफसरो की पदस्थापना की गई है. जिस तरह से घटना हुई उसने कई सवाल खड़े कर दिये है. समाज और प्रशासन में बैठे अधिकारियों के साथ सरकार को भी चिंतन करने की जरूरत है.

सदन में मामला गूंजने से जगी फिर उम्मीद
ललितपुर-सिंगरौली रेल परियोजना में जमीन के बदले नौकरी की मांग का मुद्दा सडक़ से लेकर सदन तक एक बार फिर पहुंचा है. जिन किसानो की जमीन ली गई उन्हे नौकरी नही मिली. कई वर्षो से जमीन के बदले नौकरी देने का मामला अटका हुआ है. पीडि़त किसानो को उम्मीद है कि आज नही तो कल सरकार कुछ करेगी. ठंडे बस्ते में पड़े मामले के बाद सीधी सांसद डा0 राजेश मिश्रा ने जमीन के बदले नौकरी को लेकर वर्षो से आन्दोलन कर रहे युवा किसानो की मांग पर विचार करने सदन में बात रखी. सांसद ने युवा किसानो की मांग पर गंभीरता से विचार करने का प्रश्न रखा.

सदन में मुद्दा उठाने के बाद प्रभावित हजारो किसानो में फिर एक उम्मीद जगी है कि केन्द्र सरकार उनकी पुरानी मांग पर गंभीरता से विचार कर निर्णय लेगी. कई वर्षो से पीडि़त किसानो ने धरना प्रदर्शन से लेकर आंदोलन किये, लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ नही मिला. इसके पूर्व भी तत्कालीन सांसद रीती पाठक एवं रीवा सांसद जनार्दन मिश्रा ने भी सदन में मुद्दे को उठाया पर सरकार ने कोई निर्णय नही लिया. लेकिन इस बार सदन में किसानो की मांग रखी गई जिसके बाद उम्मीद है कि कुछ होगा. रेल लाइन का भी काम युद्ध स्तर पर चल रहा है, जल्द ही रीवा से बघवार स्टेशन तक ट्रेन पहुंचेगी

Next Post

कांतिलाल- विक्रांत के खिलाफ अब मथियास का मोर्चा

Fri Mar 28 , 2025
Share on Facebook Tweet it Share on Reddit Pin it Share it Email संजय व्यास मालवा- निमाड़ की डायरी वरिष्ठ आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया और उनके पुत्र आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया अपने ही क्षेत्र में चेन की सांस नहीं ले पा रहे. उनके खिलाफ पार्टी में […]

You May Like

मनोरंजन