माथुर ने गांधी जी की सोशल ट्रस्टी की अवधारणा को साकार किया

जाने माने कानूनविद्, पूर्व महाधिवक्ता और समाजसेवी आनंद मोहन माथुर का 97 वर्ष की आयु में शनिवार अलसुबह निधन हो गया. वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे. उनके निधन से समाज ने एक ऐसा प्रहरी खो दिया, जिसने न्याय और मानवाधिकारों के लिए अनेक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयां लड़ीं. उन्होंने कई संवेदनशील मामलों में नि:स्वार्थ भाव से वकालत कर जरूरतमंदों को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. माथुर ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कानून विशेषज्ञों के रूप में देश का प्रतिनिधित्व भी किया है. इंदौर में ऐसी कोई सामाजिक संस्था नहीं होगी,जिसको आर्थिक या कानूनी मदद स्वर्गीय माथुर ने नहीं दी हो.

विचारधारा से स्वर्गीय माथुर पूरी तरह से गांधी और नेहरूवादी थे, लेकिन विपरीत विचारधारा की सामाजिक संस्थाओं को भी मदद देने में वो पीछे नहीं हटते थे. दरअसल स्वर्गीय आनंद मोहन माथुर महात्मा गांधी की सोशल ट्रस्टी की अवधारणा का साकार रूप थे. वो इतने निष्णात वकील थे कि मध्य प्रदेश के अलावा भी अनेक लोग उन्हें वकील बनाने के लिए इंदौर आते थे. उनकी कानूनी प्रतिभा की गूंज सुप्रीम कोर्ट तक थी. यदि वो चाहते तो दिल्ली में वकालत करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति, प्रतिष्ठा, धन और पद प्राप्त कर सकते थे, लेकिन उन्हें इंदौर से लगाव था. इसलिए उन्होंने कभी इदौर नहीं छोड़ा.

आर्थिक संकटों से जूझते हुए भी उन्होंने शहर के विकास के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया. उन्होंने इंदौरवासियों को झूला पुल की सौगात दी. इसके अलावा स्कीम 54 स्थित आनंद मोहन माथुर सभागृह, आनंद मोहन माथुर सेंटर फार एडवांस सर्जरी (एमवायएच), एड्स पीड़ितों के लिए मानवीय ट्रस्ट, आनंद मोहन माथुर शासकीय माध्यमिक शाला भवन, जयकुंवर बाई माथुर ओपीडी, लक्ष्मीनारायण माथुर आइसीयू, रामबाग मुक्तिधाम में पत्नी कुंती माथुर की स्मृति में कुंती माथुर सभागृह, आनंद मोहन माथुर उद्यान आदि शहर को समर्पित किए.

आनंद मोहन माथुर का जन्म इंदौर में हुआ था. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शहर के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों से प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए विधि क्षेत्र में प्रवेश किया. उन्होंने कानून की डिग्री हासिल करने के बाद न्यायिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई. वे मप्र में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल के दौरान 10 साल तक महाधिवक्ता के पद पर रहे. स्वर्गीय माथुर ने आजादी आंदोलनों में भी भाग लिया था. उन्होंने कुछ समय इंदौर की मालवा मिल में मजदूरी भी की. अप्रैल 1948 में बीएससी की परीक्षा मेरिट में उत्तीर्ण करने के बाद जब वे लखनऊ से इंदौर लौटे, तो घर की खराब आर्थिक स्थिति देखकर किसी भी प्रकार के रोजगार का संकल्प लिया. इस दौरान उन्होंने कपड़ा मिल में मजदूर के रूप में भी काम किया.

अपने श्रम और अध्ययन-मनन से उन्होंने आगे चलकर भारत के श्रेष्ठ महाधिवक्ता के रूप में पहचान बनाई. आनंद मोहन माथुर गांधीवादी विचारधारा से गहराई से जुड़े थे. उन्होंने महात्मा गांधी के आदर्शों को न केवल आत्मसात किया बल्कि उसे अपने जीवन और कार्यों में भी उतारा. नर्मदा बचाओ आंदोलन से उनका गहरा नाता था. उन्होंने इस आंदोलन का न केवल समर्थन किया, बल्कि कानूनी रूप से भी संघर्षरत रहे.आनंद मोहन माथुर न केवल विधि विशेषज्ञ थे, बल्कि वे कई भाषाओं के जानकार भी थे. हिंदी और अंग्रेजी के अलावा वे मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी और उर्दू भाषा में भी निपुण थे. जब वे मराठी बोलते थे, तो कोई यह नहीं समझ सकता था कि यह उनकी मातृभाषा नहीं है. उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि..

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