बेंगलुरु, 26 फरवरी (वार्ता) राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी कर्मचारी सीनेट (एनआईटीईएस) ने कथित सामूहिक बर्खास्तगी के लिए इंफोसिस की निंदा करते हुये उसपर मूल्यांकन में हेराफेरी करने और श्रम कानूनों को दरकिनार करने के लिए खामियों का फायदा उठाने का आरोप लगाया है।
एनआईटीईएस के अध्यक्ष हरप्रीत सिंह सलूजा ने बर्खास्तगी को ‘अमानवीय और अचानक’ बताते हुए सरकार से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। बुधवार को आयोजित एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई प्रभावित कर्मचारियों ने दावा किया कि इंफोसिस ने सामूहिक विफलताओं को अंजाम देने और बर्खास्तगी को सही ठहराने के लिए जानबूझकर अपनी आंतरिक मूल्यांकन प्रक्रिया को सख्त बनाया। एक प्रभावित प्रशिक्षु-कर्मचारी ने कहा “ 2022 में, जावा और एसक्यूएल परीक्षण अपेक्षाकृत सरल थे। लेकिन अक्टूबर 2024 में हमारे शामिल होने के बाद, कठिनाई का स्तर अचानक बढ़ गया। उत्तीर्ण प्रतिशत 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया गया और नकारात्मक अंकन शुरू किया गया, जिससे उत्तीर्ण होना लगभग असंभव हो गया।”
एक अन्य प्रशिक्षु-कर्मचारी ने आरोप लगाया कि इंफोसिस ने उन्हें आश्वासन दिया था कि तीसरे प्रयास में नकारात्मक अंकन लागू नहीं होगा, लेकिन बाद में इस वादे से मुकर गया। उन्होंने कहा, “ यह हमें विफल करने और औपचारिक रूप से छंटनी कहे बिना हमें बाहर निकालने की एक सुनियोजित चाल थी।”
श्री सलूजा ने इंफोसिस की भर्ती नीतियों की भी आलोचना करते हुये आरोप लगाया कि प्रशिक्षुओं को पूर्णकालिक कर्मचारियों के बजाय राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रशिक्षण योजना (एनएटीएस) के तहत प्रशिक्षु के रूप में अनजाने में शामिल किया गया था। उन्होंने कहा “ ऑफ़र लेटर में कभी उल्लेख नहीं किया गया कि वे प्रशिक्षु थे। इन प्रशिक्षुओं ने ऑनबोर्डिंग के लिए 2.5 साल इंतजार किया, केवल एक सरकारी सब्सिडी वाले कार्यक्रम में रखा गया, जहाँ इंफोसिस को प्रति प्रशिक्षु प्रति माह 9,000 रुपये मिलते हैं।”
बर्खास्त कर्मचारियों ने दावा किया कि उन्हें भविष्य निधि (पीएफ) कटौती के बावजूद अनुभव प्रमाणपत्र से वंचित किया गया था, जो आमतौर पर केवल औपचारिक कर्मचारियों पर लागू होता है। एक प्रशिक्षु ने सवाल किया “अगर हम कभी कर्मचारी नहीं थे, तो इंफोसिस हमारे वेतन से पीएफ क्यों काट रहा था।”
एनआईटीईएस के अध्यक्ष ने सुधारात्मक कार्रवाई नहीं किए जाने पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी देते हुये कहा कि अगर इंफोसिस जैसी कॉर्पोरेट दिग्गज बिना किसी परिणाम के कर्मचारियों को निकाल सकती है, तो इससे पूरे उद्योग को क्या संदेश जाता है। क्या कर्मचारी केवल बैलेंस शीट पर संख्याएँ हैं।
श्री सलूजा ने कहा कि पिछली शिकायतों को राज्य स्तर पर कथित रूप से खारिज किए जाने के बाद अब यह मुद्दा केंद्र सरकार के पास पहुँच गया है। पिछली बार, कर्नाटक श्रम मंत्रालय ने इंफोसिस को यह कहते हुए बचाया था कि शिकायतों में कर्मचारियों के नाम नहीं थे। उन्होंने कहा कि इस बार, 5,700 प्रभावित कर्मचारियों ने सीधे राज्य और केंद्र सरकार दोनों को शिकायतें भेजी हैं। केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने शिकायतों का ब्यौरा देते हुए एक रिपोर्ट कर्नाटक सरकार को भेजी है। हालांकि, उन्होंने इंफोसिस पर ध्यान भटकाने वाली रणनीति अपनाने का आरोप लगाया और जोर देकर कहा कि इसकी प्रदर्शन सुधार योजना (पीआईपी) केवल स्थायी कर्मचारियों पर लागू होती है, जबकि प्रशिक्षुओं की सामूहिक बर्खास्तगी पर चुप्पी साधे रखी। एनआईटीईएस ने इंफोसिस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया से बचने के लिए कई स्थानों पर बर्खास्तगी बताकर ‘ गुप्त छंटनी’ करने का आरोप लगाया। इस बार इंफोसिस ने एक ही बार में 5,700 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, जिससे इस कठोर निर्णय की गंभीरता उजागर हो गई। उन्होंने आगे दावा किया कि कई प्रशिक्षु देर रात इंफोसिस मैसूर परिसर के बाहर फंसे रह गए। उन्हें बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डों तक अपना रास्ता खुद ही तलाशना पड़ा। उन्होंने कहा कि इंफोसिस जैसी बड़ी कंपनी को अपने कर्मचारियों के साथ बेकार की संपत्ति जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।
प्रभावित कर्मचारियों ने नीति निर्माताओं और श्रम अधिकारियों से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है और इंफोसिस के इस कदम को भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में से एक द्वारा विश्वासघात बताया है।

