
प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा एवं राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने किया लोकार्पित,बाबूलाल दाहिया के मार्गदर्शन में बनी बघेलखंड की पहचान ‘बघेली बखरी’ रही आकर्षण का केंद्र
सतना। खजुराहो भारतीय स्थापत्य और मूर्ति कला का बेजोड़ नमूना होने के साथ प्रदेश का राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर का पर्यटक स्थल है . इससे ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी ने जनजातीय लोक कला राज्य संग्रहालय आदिवर्त में प्रदेश की 7 प्रमुख जनजातियों के पारंपरिक आवासों के संयोजन की परिकल्पना को साकार किया है.
एक ही परिसर में गोंड़, बैगा, कोरकू, भील, भारिया, सहरिया और कोल जनजातीय की संस्कृति को गांव की तरह परिकल्पित करने का कार्य बीते वर्ष पूर्ण हो चुका है।इनमें सांप-बिच्छू की मूर्तियां, चौखट, खेत की मेड़, धान कूटने वाली ढेकी, चक्की, सिलबट्टा जैसी वस्तुएं शामिल हैं, जो उन जनजातियों की कला और संस्कृति का सजीव अनुभव कराती हैं। जो देश विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
इसी के तहत समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से द्वितीय चरण में मध्यप्रदेश के 5 लोकांचल बुंदेलखंड, निमाड़, मालवा, बघेलखंड और चंबल की जनपदीय संस्कृति पारंपरिक आवासों को अलग-अलग शैली अनुसार विस्तारित करने का कार्य शुरू किया गया था जिनमें घर ग्रहस्ती के काम में प्रचलित उपयोगी वस्तुएं भी प्रदर्शित की गई है जिसका कार्य पूर्ण होने पर वी.डी. शर्मा सांसद एवं प्रदेश अध्यक्ष भाजपा के मुख्याआतिथ्य एवं धर्मेन्द्र सिंह लोधी राज्य मंत्री धर्म एवं संस्कृति विभाग (स्वतंत्र प्रभार) के अध्यक्षता तथा शिव शेखर शुक्ला संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव विशिष्ट अतिथि में किया गया ।
बाबूलाल के मार्गदर्शन में बनी बघेली बखरी
आदिवर्त संग्रहालय में बनाये गए मकानों में बघेलखण्ड की पहचान के लिए सतना के पद्मश्री बाबूलाल दाहिया के मार्गदर्शन में बखरी बनाई गई है। जिसका बघेली के मकान शैली का नमूना का (बघेली बखरी) रखने के लिए सुझाया गया था। पद्मश्री दाहिया के अवधारणा पर बखरी का कार्य पूर्ण हुआ। बखरी के बारे में बताया गया कि रीवा सीधी में (कटुई बखरी) कहा जाता है । बखरी में पटौहांदार लगभग 10 -10 हाथ लम्बे 2 कमरे और उन्ही के दोनों ओर की दीवालों के मध्य से अन्दर जाने के लिए 2 हाथ का गैलहरा होता है। इस तरह दोनो कमरे गैलहरा समेत लगभग पच्चीस छब्बीस हाथ लम्बे हो जाते हैं। कमरों में आंगे पीछे हवा एवं प्रकाश जाता रहे अस्तु लगभग डेढ़ हाथ लम्बी चौड़ी आंगे तथा पीछे दो-दो खिड़कियां रखी जाती हैं। सुरक्षा के दृष्टि से वह बांस की खपच्चियों य गोल लकड़ियों के छड़ों से कलात्मक जंगला युक्त बनाई जाती हैं। पीछे की दोनो खिड़कियां जहां हवा के साथ ही दूर-दूर तक खेतों की निगरानी के लिए भी होती हैं कि अगर जंगली जानवर खेत में आएं तो शोर करके उन्हें भगाया जा सके वहीं आंगे की खिड़की प्रकाश हवा और मकान की खूबसूरती के लिए ही रहती हैं। उससे बाहर से आ रहे आगंतुकों को भी देखा जा सकता है। इन कमरों का नीचे का भाग भंडार गृह के रूप में होता है और वहां घर ग्रहस्ती की तमाम वस्तुएं व कुठलों में अनाज आदि को रखा जाता है। लेकिन ऊपर के दोनों अलग-अलग खण्ड परिवार के सदस्यों के सोने के लिए ही होते हैं। लोग आसानी से ऊपर जा सकें इसलिए कमरों के अन्दर से ही मिट्टी की सीढ़ियां भी रहती हैं। पर उन दोनों पटौहांदार कमरों के चारो तरफ ओसारी बनाई जाती हैं 5 हाथ चौड़ी होती हैं।इन ओसारियों के चारों ओर होने की अवधारणा शायद प्राचीन समय में यह रहीं होंगी की ग्रहस्ती की समस्त वस्तुएं एक ही बन्द बखरी के अन्दर सुरक्षित रहें। पर ओसारी के छप्पर मकान के ऊपर बनी चारों खिड़कियों से लगभग एक हाथ नीचे से बनाए जाते हैं जो मकान को खूबसूरती प्रदान करती हैं।
इनका कहना है
खजुराहों में मेरी अवधारणा में सुझाये गये बघेली बखरी का निर्माण किया गया है। यह खजुराहो आने वाले पर्यटक जिन्होंने केवल किताबों या इतिहास में तो पढ़ा है पर देखा नहीं। अपनी प्राचीन सभ्यता जिसमें जनजातियों के रहन सहन, खान पान, वेशभूषा, आभूषण एवं उनकी कला कृतियों को साक्षात मूल स्वरूप में देख सकेंगे।
पद्मश्री बाबूलाल दाहिया
