महाकुंभनगर, 14 जनवरी (वार्ता) दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महासमागम के महाकुंभ में अखाडों के साथ नागा और साधु-संतो ने “अमृत स्नान” के लिए त्रिवेणी के संगम तट पर सुबह सवा छह बजे से आस्था की डुबकी लगाने का क्रम शुरू किया।
मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर हल्की फुहार के बीच महाकुंभ 2025 के पहले “अमृत स्नान” के लिए 14 जनवरी की भोर से ही सभी 13 अखाड़े अपने जुलूस के साथ संगम तट पर जाने के लिए तैयार दिखे। हाथी, घोड़े, ऊँट पर सवार साधु-संत हाथों में त्रिशूल, गदा, भाला-बरछी लेकर ‘जय श्री राम’, ‘हर हर महादेव’ के जयघोष के साथ जब संगम तट के लिए निकले तो कई किलोमीटर लंबी लाइन लग गई। संतों, संन्यासियों और नागा साधुओं को देखने के लिए अखाड़ा मार्ग के दोनों ओर लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उनके दर्शन के लिए खड़ी रही। सभी अखाड़े अपने क्रम के अनुसार अमृत स्नान करेंगे।
राजस्थान के जिला पाली से श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के महामंडलेश्वर स्वामी चेतन गिरी ने बताया कि सबसे पहले महानिर्वाण एवं शंभू पंचायती अटल अखाड़ा ने अमृत स्नान का श्री गणेश किया। उन्होंने कहा कि, ‘हम महाकुंभ में भारतीय सभ्यता की भव्यता का अनुभव कर रहे हैं। करोड़ों लोग हमारी संस्कृति का गौरव देख रहे हैं। हर तरफ खुशी और उत्साह है। लोग ठंड को भूल कर रात दो बजे से ही संतों के दर्शन का इंतजार कर रहे हैं। यहां अविश्वसनीय दृश्य हैं। जो लोग जातीय विभाजन पैदा करते हैं और हमारे धर्म पर दोषारोपण करते हैं, उन्हें यहां आकर देखना चाहिए कि करोड़ों की भीड़ में कोई ब्राह्मण या शूद्र नहीं है, केवल हिंदू और हिंदू संस्कृति है।’’
महामंडलेश्वर ने बताया कि महानिर्वाणी अखाडे से आचार्य महामंडलेश्वर विश्वेकानंद महराज के साथ 68 महामंडलेश्वर और बड़ी संख्या में मंडलेश्वर, साधु-संत और नागा संतो ने सबसे पहले महाकुंभ का “अमृत स्नान” किया। अनेकों संत महातमा अपने अपने भक्तों के साथ स्नान किए।
उन्होंने बताया कि जब देव और दानव में अमृत को लेकर द्वंद हुआ और उसके बाद जहां जहां अमृत की बूंदे गिरी वहीं कुंभ का आयोजन होता है। हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज। अर्ध कुंभ केवल हरिद्वार और प्रयागराज में लगता है। उन्होंने कहा कि तीर्थों के राजा प्रयागराज में जब 12 साल का पूर्ण कुंभ 12 बार पूरा होता है तब 144 साल बाद फिर प्रयागराज में महाकुंभ लगता है।
महामंडलेश्वर ने कहा कि हमें अपने धर्म, कर्म का इमानदारी से पालन करेंगे तो हमारी आने वाली पीढी सुरक्षित और संरक्षित रहेगी। हमारे सनातन धर्म पर कई बार कुठाराघात करने का प्रयास किया गया लेकिन उस पर किसी प्रकार का कोई असर नहीं हुआ। उसे मिटाने वाले खुद ही मिट गए। न्होंने कहा कि बहुत से अन्य धर्म पानी के बुलबुले की तरह आए और मिट गए लेकिन हमारा सनातन धर्म आदि अनादिकाल से है और आगे भी रहेगा, इसपर कोई आंच तक नहीं आएगा।
