नई दिल्ली, सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इन दिनों 13 नवंबर 2026 को दुनिया के खत्म होने की चर्चाएं तेजी से फैल रही हैं। दावों के मुताबिक करीब 66 साल पहले वैज्ञानिकों ने इसी दिन पृथ्वी के विनाश की भविष्यवाणी की थी। हालांकि, इस सनसनीखेज दावे की सच्चाई कुछ और ही है। इसकी असली शुरुआत 4 नवंबर 1960 को अमेरिकी विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित एक शोध से हुई थी, जिसका शीर्षक ‘डूम्सडे: फ्राइडे, 13 नवंबर, एडी 2026’ था। ऑस्ट्रियाई-अमेरिकी भौतिक विज्ञानी हाइन्ज फॉन फॉर्स्टर और उनके साथियों द्वारा तैयार किए गए इस अध्ययन में किसी प्राकृतिक आपदा या प्रलय की बात नहीं कही गई थी, बल्कि यह ऐतिहासिक वृद्धि दरों के आधार पर वैश्विक आबादी के गणितीय मॉडल का एक आकलन मात्र था।
वैज्ञानिकों के हाइपरबोलिक ग्रोथ मॉडल का हिस्सा था कयामत का दिन, खगोलविदों ने पृथ्वी पर किसी भी खतरे से साफ किया इनकार
शोधकर्ताओं ने 1958 तक के जनसंख्या आंकड़ों का अध्ययन कर यह दर्शाया था कि यदि आबादी इसी तीव्र गति से बढ़ती रही, तो एक गणितीय स्थिति (सिंगुलैरिटी) के तहत 2026 तक यह संख्या अनंत तक पहुंच सकती है। इस अध्ययन में उपयोग किया गया ‘डूम्सडे’ शब्द केवल एक काल्पनिक गणितीय बिंदु को दर्शाने के लिए था, न कि एस्टेरॉयड, भूकंप या सूर्य के विस्फोट जैसी किसी वैश्विक आपदा का संकेत। खगोलविद इमाद मुजाहिद ने भी स्पष्ट किया है कि 13 नवंबर 2026 को ऐसी कोई भी ज्ञात खगोलीय घटना नहीं घटने वाली है जिससे पृथ्वी की सुरक्षा को कोई खतरा हो। मिस्र के अखबार में छपे पुराने लेख और सूर्य के सौर तूफानों से जुड़ी अफवाहों का इस वैज्ञानिक अध्ययन से कोई लेना-देना नहीं है।
वास्तविक दुनिया में गलत साबित हुआ 1960 का अनुमान, यूएन रिपोर्ट के मुताबिक 2080 के दशक में 10.3 अरब पहुंचेगी वैश्विक आबादी
समय के साथ दुनिया में हुए सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण 1960 का वह गणितीय अनुमान वास्तविक धरातल पर खरा नहीं उतरा। जन्म दर में गिरावट, परिवार नियोजन और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी हुई है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में दुनिया की आबादी 8.2 अरब से अधिक है, जो 2080 के दशक के मध्य तक लगभग 10.3 अरब तक पहुंचकर स्थिर हो सकती है। अतः 13 नवंबर 2026 को दुनिया के अंत की बातें केवल एक गलतफहमी और सोशल मीडिया की अफवाह हैं, जिनका वास्तविकता और विज्ञान से कोई संबंध नहीं है।

