नई दिल्ली, भारतीय वायुसेना के बेड़े से मिग-29, मिराज-2000 और जगुआर जैसे पुराने लड़ाकू विमानों के चरणबद्ध तरीके से सेवामुक्त होने से देश की रक्षा तैयारियों के समक्ष गंभीर चुनौती पैदा हो रही है। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह के अनुसार, स्वीकृत 42.5 स्क्वाड्रन की तुलना में वायुसेना की वर्तमान संख्या घटकर महज 29 स्क्वाड्रन रह गई है। इस परिचालन अंतर को पाटने और देश की हवाई सुरक्षा सीमाओं को मजबूत बनाए रखने के लिए भारतीय वायुसेना को हर साल कम से कम 36 से 40 नए अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों (लगभग दो नए स्क्वाड्रन) को अपने बेड़े में शामिल करने की सख्त जरूरत है।
तेजस मार्क-1A के उत्पादन में तेजी लाने का प्रयास, निजी कंपनियों की भागीदारी से सालाना निर्माण क्षमता बढ़ाने का सुझाव
भारतीय विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने तेजस मार्क-1A के निर्माण की गति को बढ़ाते हुए प्रतिवर्ष 24 जेट बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वायुसेना की जरूरतों को समय पर पूरा करने के लिए एचएएल द्वारा उत्पादन की रफ्तार अमेरिका से मिलने वाले जीई F404 इंजनों की आपूर्ति पर निर्भर है। विशेषज्ञों और पूर्व वायुसेना प्रमुख ने लड़ाकू विमानों के निर्माण में टाटा-एयरबस जैसे सफल उपक्रमों की तर्ज पर निजी रक्षा क्षेत्र की कंपनियों को शामिल करने का सुझाव दिया है, ताकि हर साल अतिरिक्त 12 से 18 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
अमेरिका की GE एयरोस्पेस के साथ ‘मेक इन इंडिया’ इंजन एमआरओ समझौता, भारत में ही होगा तेजस इंजनों का रखरखाव
भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिकी कंपनी जीई (GE) एयरोस्पेस के साथ F404-IN20 इंजनों के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल (MRO) डिपो की स्थापना के लिए एक ऐतिहासिक समझौता किया है। इस सुविधा केंद्र का पूर्ण स्वामित्व और संचालन भारतीय वायुसेना के पास होगा, जबकि अमेरिकी कंपनी तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और स्पेयर पार्ट्स मुहैया कराएगी। देश के भीतर ही जेट इंजनों की मरम्मत होने से जहाजों की उपलब्धता बढ़ेगी, रखरखाव में लगने वाला समय कम होगा और विदेशी निर्भरता में भारी कमी आएगी।

