शिवपुरी। शहर में अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हो चुके हैं, इसकी भयावह तस्वीर उस समय सामने आई जब पुलिस अधीक्षक के बंगले से महज 250 मीटर दूर, शहर के व्यस्त इलाके में स्थित सेंट्रल बैंक में नकाबपोश बदमाश पिस्टल लेकर घुस गए। बैंक अधिकारी को धमकाया, नकदी मांगी और जब रकम हाथ नहीं लगी तो आराम से बाइक पर सवार होकर निकल गए। सवाल शिवपुरी मे सिर्फ एक बैंक में लूट के प्रयास का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है, जिसके रहते अपराधियों में कानून का भय कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
आखिर अपराधियों में इतनी हिम्मत आई कहां से, क्या शहर में पुलिस की गश्त और निगरानी पर्याप्त नहीं है। क्या अपराधियों को यह भरोसा होने लगा है कि वारदात करके आसानी से निकला जा सकता है। यदि पुलिस अधीक्षक के आवास के इतने करीब स्थित बैंक में हथियारबंद बदमाश बेखौफ घुस सकते हैं, तो सामान्य नागरिक और दूरदराज के बाजार खुद को कितना सुरक्षित महसूस करें।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसी बैंक में 16 अक्टूबर को भी चोरी का प्रयास हो चुका है। उस घटना का खुलासा होने से पहले दूसरी वारदात का प्रयास हो गया। आखिर पहली घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा क्यों नहीं हुई? सुरक्षा गार्ड की तैनाती क्यों नहीं की गई? क्या पुलिस ने पहली घटना के बाद संवेदनशील बैंक परिसरों की निगरानी बढ़ाई थी ?
बेशक पुलिस अधिकारी तत्काल मौके पर पहुंचे और सीसीटीवी फुटेज खंगाल रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि पुलिस की सक्रियता अपराध होने के बाद ही क्यों दिखाई दी? अपराध रोकने वाली सतर्कता कहां है?
शिवपुरी पुलिस के सामने अब केवल तीन बदमाशों को पकड़ने की चुनौती नहीं, बल्कि जनता का भरोसा मजबूत करने की भी चुनौती है। जरूरत है कि शहर के बैंकों, बाजारों और संवेदनशील स्थानों का सुरक्षा ऑडिट हो, शाम की गश्त प्रभावी बनाई जाए और पहले से लंबित अपराधों की समीक्षा की जाए।
