भागलपुर, ‘मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है’—इस कहावत को बिहार के भागलपुर जिले के परबत्ती इलाके में रहने वाले युवा प्रिंस कुमार ने अपने कड़े संघर्ष से सच साबित कर दिखाया है। बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रिंस का चयन पेनचक सिलाट (मार्शल आर्ट) की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ है, जो उज्बेकिस्तान में आयोजित होने जा रही है। इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रिंस 33 देशों के धुरंधर खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करेंगे। उनके पिता दीपक मंडल एक छोटी सी नाश्ता की दुकान चलाकर परिवार का गुजारा करते हैं, लेकिन उन्होंने तंगहाली को अपने बेटे के सपनों के आड़े नहीं आने दिया।
कठिन अभ्यास और 12वीं की पढ़ाई के बीच संतुलन बना रहे हैं प्रिंस, कोच कुंदन के मार्गदर्शन में कर रहे हैं कड़ी मेहनत
खेल और पढ़ाई के बीच बेहतरीन तालमेल बिठाते हुए प्रिंस रोजाना लगभग चार घंटे पसीना बहा रहे हैं, साथ ही अपनी 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी भी कर रहे हैं। अभ्यास के दौरान कई बार चोट लगने और सीमित संसाधनों की चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनके कोच कुंदन के मार्गदर्शन और किलकारी के सहयोग से उनकी प्रतिभा को निखरने का अवसर मिला। इससे पहले भी प्रिंस राष्ट्रीय स्तर पर अपनी खेल प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं और कई पुरस्कार हासिल कर चुके हैं, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पदक जीतने की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।
सरकार से मदद की आस लगाए बैठा है प्रतिभावान खिलाड़ी का परिवार, देश का नाम रोशन करने का है दृढ़ संकल्प
बेटे की इस बड़ी सफलता से पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है, हालांकि आर्थिक तंगी अभी भी उनके सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। परिवार ने खेल के लिए वित्तीय सहायता हेतु प्रशासनिक स्तर पर प्रयास भी किए हैं ताकि आर्थिक अभाव के कारण प्रिंस की तैयारी में कोई बाधा न आए। बावजूद इसके, प्रिंस के हौसले बुलंद हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य उज्बेकिस्तान के इस मंच पर तिरंगा लहराकर देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना है। भागलपुर के इस युवा की प्रेरणादायक कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो गरीबी के आगोश में पलने वाले सपने भी आसमान छू सकते हैं।

