मध्यप्रदेश के सागर और देवास में 51 दिन के भीतर जहरीली शराब से 35 लोगों की मौत महज हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी की गंभीर विफलता है. सागर के बंडा में 20 और देवास में 15 लोगों की जान जाना बताता है कि अवैध शराब का कारोबार रोकने के लिए जिम्मेदार तंत्र अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रहा. दोनों जिलों के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों को हटाने तथा देवास में तीन आबकारी अधिकारियों को निलंबित करने की कार्रवाई हुई है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इससे ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रुक जाएगी ?
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करता है. सरकार की पारदर्शी और जनहित कार्य नीतियों को लागू करने की जवाबदारी सरकारी तंत्र की है.सागर और देवास की घटनाएं बताती हैं कि निगरानी और जवाबदेही के मौजूदा तंत्र में गंभीर खामियां हैं. जाहिर है इन्हें दूर किए बिना सुशासन का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता.अवैध शराब का कारोबार किसी एक दिन में खड़ा नहीं होता. उसके निर्माण, परिवहन और बिक्री के पीछे एक नेटवर्क काम करता है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि संबंधित क्षेत्रों में इसकी गतिविधियों का पता क्यों नहीं चला ? पुलिस को इसकी भनक क्यों नहीं लगी और आबकारी विभाग की निगरानी कहां थी ? यदि शिकायतें मिली थीं, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? और यदि शिकायतें नहीं मिलीं, तो क्या विभागों की सूचना जुटाने और निगरानी करने की व्यवस्था ही निष्प्रभावी है ? इन सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है.
कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक जिले की प्रशासनिक और कानून-व्यवस्था संबंधी जिम्मेदारियों के प्रमुख अधिकारी होते हैं. वहीं, अवैध शराब पर नियंत्रण आबकारी विभाग की सीधी जिम्मेदारी है. इन विभागों के बीच समन्वय की कमी या कर्तव्य में लापरवाही का परिणाम नागरिकों को अपनी जान देकर भुगतना पड़े, तो इसे सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नहीं छोड़ा जा सकता. अधिकारियों को हटाना तात्कालिक कदम हो सकता है, लेकिन जवाबदेही तभी स्थापित होगी, जब जांच में लापरवाही के कारणों और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए. किसी स्तर पर मिलीभगत सामने आए, तो दोषियों को भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए.
जहरीली शराब के खिलाफ अभियान किसी बड़ी घटना के बाद शुरू होकर कुछ दिनों में ठंडा नहीं पडऩा चाहिए. संवेदनशील इलाकों की नियमित निगरानी, अवैध शराब के स्रोतों और आपूर्ति नेटवर्क की पहचान तथा पुलिस-आबकारी विभाग की संयुक्त कार्रवाई स्थायी व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए. साथ ही, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और जिला स्तर पर जवाबदेही की नियमित समीक्षा होनी चाहिए. छोटे विक्रेताओं पर कार्रवाई करके बड़े नेटवर्क को बच निकलने देना इस समस्या का समाधान नहीं है.
सागर और देवास की घटनाएं चेतावनी हैं कि प्रशासनिक ढिलाई की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ती है. अब जरूरत केवल पदस्थापना बदलने की नहीं, बल्कि उन खामियों को दूर करने की है, जिनसे अवैध कारोबार फलता-फूलता है. जीरो टॉलरेंस का अर्थ तभी सार्थक होगा, जब लापरवाही पर प्रभावी कार्रवाई हो और ऐसी मौतों की पुनरावृत्ति रोकने के ठोस परिणाम दिखाई दें. 35 लोगों की मौत के बाद व्यवस्था से यही अपेक्षा है कि वह जवाबदेही तय करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी परिवार को फिर ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े.
